Thursday, February 26, 2026

हमारा काम सिर्फ़ तमाशा करना है...


हम तुम घंटियां बजते ही पिंजरों से
निकल कर बाहर आते हैं
नये नये करतब दिखाते हैं
दुश्मनों की तरह एक दूसरे से टकराते हैं
जब लड़-झगड़ के थक जाते हैं
तो वापस अपने पिंजरों में क़ैद हो जाते हैं
हमें हमारी लड़ाई की वजह मालूम नहीं
मुर्गों की हाथापाई 

सांप और मोर की लड़ाई 
शेर और बैल की मार कटाई 
नये राजे नवाबों के पुराने खेल हैं
हम तो सिर्फ़ लड़ाये जाते हैं
हमारा काम सिर्फ़ तमाशा करना है
दूसरों के लिए जीना है
दूसरों के लिए मरना है ...!!


अज्ञात 

खो गई वो... चिट्ठियाँ...

खो गई वो...
चिट्ठियाँ...

जिनमे लिखने के सलीके छुपे होते थे
कुशलता की कामना से शुरू होते थे,
बड़ों के चरणस्पर्श पर ख़त्म होते थे

और बीच में लिखी होती थी जिंदगी...

नन्हें के आने की खबर,
मां की तबियत का दर्दं,
और पैसे भेजने का अनुनय, विनय
फसलों के अच्छा या खराब होने की वजह

कितना कुछ सिमट जाता था
एक नीले से कागज में.... हाले दिल यार को लिखूं कैसे, 
हाथ दिल से जुदा नहीं होता

जिसे नवयौवना भाग कर सीने से लगाती
और अकेले में आंखों से आंसू बहाती
ख़त की इबारत पर पानी की बूंद से बिखरे शब्द 
बहुत कुछ बयां करते थे खामोश रह कर

मां की आस थी 
पिता का संबल थी 
बच्चों का भविष्य थी 
और गांव का गौरव थी ये चिट्ठियाँ

डाकिया चिट्ठी लाएगा
कोई बांच कर सुनाएगा
देख देख चिट्ठी को
कई कई बार छू कर चिट्टी को
अनपढ़ भी
एहसासों को पढ़ लेते थे

अब तो स्क्रीन पर अंगूठा दौड़ता है
और अक्सर ही दिल तोड़ता हैं
मोबाइल का स्पेस भर जाए तो
सब कुछ दो मिनिट में डिलीट होता है

सब कुछ सिमट गया छै इंच में
जैसे मकान सिमट गए फ्लैटों में
जज्बात सिमट गए मैसेजों में
चूल्हे सिमट गए गैसों में,

और इंसान सिमट गए पैसों में ....... !!

कभी कभी मेरे दिल में ख्याल आता है...


 

ये महलों ये तख़्तों ये ताजों की दुनिया...

ये महलों ये तख़्तों ये ताजों की दुनिया
ये इंसाँ के दुश्मन समाजों की दुनिया

ये दौलत के भूके रिवाजों की दुनिया
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है

हर इक जिस्म घायल हर इक रूह प्यासी
निगाहों में उलझन दिलों में उदासी

ये दुनिया है या 'आलम-ए-बद-हवासी
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है

यहाँ इक खिलौना है इंसाँ की हस्ती
ये बस्ती है मुर्दा-परस्तों की बस्ती

यहाँ पर तो जीवन से है मौत सस्ती
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है

जवानी भटकती है बद-कार बन कर
जवाँ जिस्म सजते हैं बाज़ार बन कर

यहाँ प्यार होता है बेव्पार बन कर
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है

ये दुनिया जहाँ आदमी कुछ नहीं है
वफ़ा कुछ नहीं दोस्ती कुछ नहीं है

जहाँ प्यार की क़द्र ही कुछ नहीं है
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है

जला दो इसे फूँक डालो ये दुनिया
मिरे सामने से हटा लो ये दुनिया

तुम्हारी है तुम ही सँभालो ये दुनिया
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है ।


साहिर लुधियानवी ✍️ 

चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाएँ हम दोनों...

चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाएँ हम दोनों
न मैं तुम से कोई उम्मीद रखूँ दिल-नवाज़ी की

न तुम मेरी तरफ़ देखो ग़लत-अंदाज़ नज़रों से
न मेरे दिल की धड़कन लड़खड़ाए मेरी बातों से

न ज़ाहिर हो तुम्हारी कश्मकश का राज़ नज़रों से
तुम्हें भी कोई उलझन रोकती है पेश-क़दमी से

मुझे भी लोग कहते हैं कि ये जल्वे पराए हैं
मिरे हमराह भी रुस्वाइयाँ हैं मेरे माज़ी की

तुम्हारे साथ भी गुज़री हुई रातों के साए हैं
तआ'रुफ़ रोग हो जाए तो उस का भूलना बेहतर

त'अल्लुक़ बोझ बन जाए तो उस को तोड़ना अच्छा
वो अफ़्साना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन

उसे इक ख़ूब-सूरत मोड़ दे कर छोड़ना अच्छा
चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाएँ हम दोनों ।


साहिर लुधियानवी ✍️ 


कभी कभी मिरे दिल में ख़याल आता है...

कभी कभी मिरे दिल में ख़याल आता है
कि ज़िंदगी तिरी ज़ुल्फ़ों की नर्म छाँव में

गुज़रने पाती तो शादाब हो भी सकती थी
ये तीरगी जो मिरी ज़ीस्त का मुक़द्दर है

तिरी नज़र की शुआ'ओं में खो भी सकती थी
अजब न था कि मैं बेगाना-ए-अलम हो कर

तिरे जमाल की रानाइयों में खो रहता
तिरा गुदाज़-बदन तेरी नीम-बाज़ आँखें

इन्ही हसीन फ़सानों में महव हो रहता
पुकारतीं मुझे जब तल्ख़ियाँ ज़माने की

तिरे लबों से हलावत के घूँट पी लेता
हयात चीख़ती फिरती बरहना सर और मैं

घनेरी ज़ुल्फ़ों के साए में छुप के जी लेता
मगर ये हो न सका और अब ये आलम है

कि तू नहीं तिरा ग़म तेरी जुस्तुजू भी नहीं
गुज़र रही है कुछ इस तरह ज़िंदगी जैसे

इसे किसी के सहारे की आरज़ू भी नहीं
ज़माने भर के दुखों को लगा चुका हूँ गले

गुज़र रहा हूँ कुछ अन-जानी रहगुज़ारों से
मुहीब साए मिरी सम्त बढ़ते आते हैं

हयात ओ मौत के पुर-हौल ख़ारज़ारों से
न कोई जादा-ए-मंज़िल न रौशनी का सुराग़

भटक रही है ख़लाओं में ज़िंदगी मेरी
इन्ही ख़लाओं में रह जाऊँगा कभी खो कर

मैं जानता हूँ मिरी हम-नफ़स मगर यूँही
कभी कभी मिरे दिल में ख़याल आता है ।


साहिर लुधियानवी ✍️ 

Tuesday, February 24, 2026

कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता...


 

नज़र-नवाज़ नज़ारा बदल न जाए कहीं ...

नज़र-नवाज़ नज़ारा बदल न जाए कहीं 
ज़रा सी बात है मुँह से निकल न जाए कहीं

वो देखते हैं तो लगता है नीव हिलती है 
मिरे बयान को बंदिश निगल न जाए कहीं

यूँ मुझ को ख़ुद पे बहुत ए'तिबार है लेकिन 
ये बर्फ़ आँच के आगे पिघल न जाए कहीं

चले हवा तो किवाड़ों को बंद कर लेना 
ये गर्म राख शरारों में ढल न जाए कहीं

तमाम रात तिरे मय-कदे में मय पी है 
तमाम उम्र नशे में निकल न जाए कहीं

कभी मचान पे चढ़ने की आरज़ू उभरी 
कभी ये डर कि ये सीढ़ी फिसल न जाए कहीं

ये लोग होमो-हवन में यक़ीन रखते हैं 
चलो यहाँ से चलें हाथ जल न जाए कहीं ।


दुष्यंत कुमार✍️

महफिल में छुपाने पड़े जज़्बात किसी से...

महफिल में छुपाने पड़े जज़्बात किसी से 
होकर भी न हो पाई, मुलाक़ात किसी से

दिन-रात कसक रहती है कुछ रोज से दिल में 
ले बैठे हैं हम दर्द की सौगात किसी से

कुछ उनको तकल्लुफ सा है कुछ हमको हया सी 
ऐसे में जो होगी, तो हो क्या बात किसी से

वो रात जो भर देती है दामन में सितारे 
मांगी हैं मेरे दिल ने वही रात किसी से ।


साहिर लुधियानवी ✍️