Tuesday, March 3, 2026

तुम्हारा साथ जैसे...

तुम्हारा साथ जैसे
गुल में खुशबू
जिस्म में रूह
तुम्हारा साथ 
जैसे पहली बारिश के बाद 
मिट्टी से उठती खुशबू 


तुम्हारा साथ 
जैसे अंत के बाद शुरू
मुझ में वजूद तेरा
तुम मे वजूद मेरा
तू नहीं तो में नहीं 
तेरी मेरी प्रेम कहानी 
जैसे दो जिस्म
एक रूह....!!


गुरिंदर सिंह ✍️



हम्द..

नील गगन पर बैठे
कब तक
चांद सितारों से झांकोगे
पर्वत की ऊंची चोटी से
कब तक दुनिया देखोगे 
आदर्शों के बंद ग्रंथों में
कब तक आराम करोगे 
मेरा छप्पर
टपक रहा है
बनकर सूरज
इसे सुखाओ
खाली है
आटे का कनस्तर
बनकर गेहूं
इसमें आओ
मां का चश्मा
टूट गया है
बनकर शीशा
इसे बनाओ
चुप चुप हैं आँगन में बच्चे
बनकर गेंद
इन्हें बहलाओ
शाम हुई है चांद उगाओ
पेड़ हिलाओ
हवा चलाओ
काम बहुत हैं
हाथ बटाओ अल्ला मिंया
मेरे घर भी आ ही जाओ
अल्ला मिंया... ।


निदा फ़ाज़ली ✍️ 

नज़्म बहुत आसान थी पहले...

नज़्म बहुत आसान थी पहले
घर के आगे
पीपल की शाख़ों से उछल के
आते जाते
बच्चों के बस्तों से निकल के
रंग-ब-रंगी
चिड़ियों की चहकार में ढल के
नज़्म मिरे घर जब आती थी
मेरे क़लम से, जल्दी जल्दी
ख़ुद को पूरा लिख जाती है
अब सब मंज़र
बदल चुके हैं
छोटे छोटे चौराहों से
चौड़े रस्ते निकल चुके हैं
नए नए बाज़ार
पुराने गली मोहल्ले निगल चुके हैं
नज़्म से मुझ तक
अब कोसों लम्बी दूरी है
इन कोसों लम्बी दूरी में
कहीं अचानक
बम फटते हैं
कोख में माओं के
सोते बच्चे कटते हैं
मज़हब और सियासत
दोनों
नए नए नारे रटते हैं
बहुत से शहरों
बहुत से मुल्कों से
अब चल कर
नज़्म मिरे घर जब आती है
इतनी ज़ियादा थक जाती है
मेरे लिखने की टेबल पर
ख़ाली काग़ज़ को
ख़ाली ही छोड़ के रुख़्सत हो जाती है
और किसी फ़ुट-पाथ पे जा कर
शहर के 
सब से बूढ़े शहरी की
पलकों पर!
आँसू बन कर सो जाती है ।


निदा फ़ाज़ली ✍️ 

बस यूँ ही जीते रहो...

बस यूँही जीते रहो
कुछ न कहो
सुब्ह जब सो के उठो
घर के अफ़राद की गिनती कर लो
टाँग पर टाँग रखे
रोज़ का अख़बार पढ़ो
उस जगह क़हत गिरा
जंग वहाँ पर बरसी
कितने महफ़ूज़ हो तुम शुक्र करो
रेडियो खोल के फ़िल्मों के नए गीत सुनो
घर से जब निकलो तो
शाम तक के लिए होंटों में तबस्सुम सी लो
दोनों हाथों में मुसाफ़हे भर लो
मुँह में कुछ खोखले, बे-मअ'नी से जुमले रख लो 


मुख़्तलिफ़ हाथों में सिक्कों की तरह घिसते रहो
कुछ न कहो
उजली पोशाक
समाजी इज़्ज़त 
और क्या चाहिए जीने के लिए
रोज़ मिल जाती है पीने के लिए
बस यूँ ही जीते रहो
कुछ न कहो ।


निदा फ़ाज़ली ✍️ 


अफ़राद: सदस्य, लोग
क़हत: अकाल, भुखमरी
महफ़ूज़: सुरक्षित
तबस्सुम: मुस्कान
मुसाफ़हे: हाथ मिलाना (handshakes)
बे-मअ'नी: अर्थहीन
मुख़्तलिफ़: अलग-अलग
समाजी: सामाजिक 

Monday, March 2, 2026

ख़ुदा ख़ामोश है'...

बहुत से काम हैं
लिपटी हुई धरती को फैला दें
दरख़्तों को उगाएँडालियों पे फूल महका दें
पहाड़ों को क़रीने से लगाएँ
चाँद लटकाएँ
ख़लाओं के सरों पे नील-गूँ आकाश फैलाएँ
सितारों को करें रौशन
हवाओं को गती दे दें
फुदकते पत्थरों को पँख दे कर नग़्मगी दे दें
लबों को मुस्कुराहट
अँखड़ियों को रौशनी दे दें
सड़क पर डोलती परछाइयों को ज़िंदगी दे दें
ख़ुदा ख़ामोश है!
तुम आओ तो तख़्लीक़ हो दुनिया
मैं इतने सारे कामों को अकेला कर नहीं सकता । 


निदा फ़ाज़ली ✍️

Sunday, March 1, 2026

बे-घर


शाम होने को है
लाल सूरज समुंदर में खोने को है
और उस के परे
कुछ परिंदे
क़तारें बनाए
उन्हीं जंगलों को चले
जिन के पेड़ों की शाख़ों पे हैं घोंसले
ये परिंदे
वहीं लौट कर जाएँगे
और सो जाएँगे
हम ही हैरान हैं
इस मकानों के जंगल में
अपना कहीं भी ठिकाना नहीं
शाम होने को है
हम कहाँ जाएँगे ।


जावेद अख्तर ✍️ 

अजीब क़िस्सा है

अजीब क़िस्सा है
जब ये दुनिया समझ रही थी
तुम अपनी दुनिया में जी रही हो
मैं अपनी दुनिया में जी रहा हूँ
तो हम ने सारी निगाहों से दूर
एक दुनिया बसाई थी
जो कि मेरी भी थी
तुम्हारी भी थी
जहाँ फ़ज़ाओं में
दोनों के ख़्वाब जागते थे
जहाँ हवाओं में
दोनों की सरगोशियाँ घुली थीं
जहाँ के फूलों में
दोनों की आरज़ू के सब रंग
खिल रहे थे
जहाँ पे दोनों की जुरअतों के
हज़ार चश्मे उबल रहे थे
न वसवसे थे न रंज-ओ-ग़म थे
सुकून का गहरा इक समुंदर था
और हम थे


अजीब क़िस्सा है
सारी दुनिया ने
जब ये जाना
कि हम ने सारी निगाहों से दूर
एक दुनिया बसाई है तो
हर एक अबरू ने जैसे हम पर कमान तानी
तमाम पेशानियों पे उभरीं
ग़म और ग़ुस्से की गहरी शिकनें
किसी के लहजे से तल्ख़ी छलकी
किसी की बातों में तुरशी आई
किसी ने चाहा
कि कोई दीवार ही उठा दे
किसी ने चाहा
हमारी दुनिया ही वो मिटा दे
मगर ज़माने को हारना था
ज़माना हारा
ये सारी दुनिया को मानना ही पड़ा
हमारे ख़याल की एक सी ज़मीं है
हमारे ख़्वाबों का एक जैसा ही आसमाँ है
मगर पुरानी ये दास्ताँ है
कि हम पे दुनिया
अब एक अर्से से मेहरबाँ है
अजीब क़िस्सा है
जब कि दुनिया ने
कब का तस्लीम कर लिया है
हम एक दुनिया के रहने वाले हैं
सच तो ये है
तुम अपनी दुनिया में जी रही हो
मैं अपनी दुनिया में जी रहा हूँ ...!!


जावेद अख्तर ✍️ 

उलझन

करोड़ों चेहरे
और उन के पीछे
करोड़ों चेहरे
ये रास्ते हैं कि भिड़ के छत्ते
ज़मीन जिस्मों से ढक गई है
क़दम तो क्या तिल भी धरने की अब जगह नहीं है
ये देखता हूँ तो सोचता हूँ
कि अब जहाँ हूँ
वहीं सिमट के खड़ा रहूँ मैं
मगर करूँ क्या
कि जानता हूँ
कि रुक गया तो
जो भीड़ पीछे से आ रही है
वो मुझ को पैरों तले कुचल देगी पीस देगी
तो अब जो चलता हूँ मैं
तो ख़ुद मेरे अपने पैरों में आ रहा है
किसी का सीना
किसी का बाज़ू
किसी का चेहरा
चलूँ
तो औरों पे ज़ुल्म ढाऊँ
रुकूँ
तो औरों के ज़ुल्म झेलूँ
ज़मीर
तुझ को तो नाज़ है अपनी मुंसिफ़ी पर
ज़रा सुनूँ तो
कि आज क्या तेरा फ़ैसला है ।


जावेद अख्तर ✍️ 


ए'तिराफ़

सच तो ये है क़ुसूर अपना है
चाँद को छूने की तमन्ना की
आसमाँ को ज़मीन पर माँगा
फूल चाहा कि पत्थरों पे खिले
काँटों में की तलाश ख़ुश्बू की
आग से माँगते रहे ठंडक
ख़्वाब जो देखा
चाहा सच हो जाए
इस की हम को सज़ा तो मिलनी थी ।


जावेद अख्तर ✍️ 



Saturday, February 28, 2026

और कुछ दिन यहाँ रुकने का बहाना मिलता...

और कुछ दिन यहाँ रुकने का बहाना मिलता
इस नए शहर में कोई तो पुराना मिलता

मैं तो जो कुछ भी था जितना भी था सब मिट्टी था
तुम अगर ढूँडते मुझ में तो ख़ज़ाना मिलता

मुझ को हँसने के लिए दोस्त मयस्सर हैं बहुत
काश रोने के लिए भी कोई शाना मिलता

मैं कड़ी धूप में भटका हूँ तुम्हारी ख़ातिर
तुम जो मिल जाते तो मौसम भी सुहाना मिलता

मेरे आँसू तिरी आँखों से छलकते किसी रोज़
तेरी ज़ुल्फ़ों से किसी दिन मिरा शाना मिलता

तुम ने जाते हुए देखा ही नहीं मेरी तरफ़
वर्ना मुझ में तुम्हें अपना ही फ़साना मिलता

साथ रहने की चुकाई है बड़ी क़ीमत भी
छोड़ देते जो तुझे हम तो ज़माना मिलता

खेत पर लगने लगे पहरे ख़ज़ानों की तरह
यूँ न होता तो परिंदों को भी दाना मिलता

ले गए हम ही उसे मंदिर-ओ-मस्जिद की तरफ़
वर्ना हर राह में उस का ही ठिकाना मिलता ।


शकील आज़मी ✍️