Saturday, April 4, 2026

वो जो हम में तुम में क़रार था

 वो जो हम में तुम में क़रार था, तुम्हे याद हो के न याद हो, 
वही यानि वादा-निबाह का, तुम्हे याद हो के न याद हो।


वो नए गिले, वो शिकायतें, वो मज़े मज़े की हिकायतें, 
वो हर एक बात पे रूठना, तुम्हें याद हो के न याद हो।


कोई बात ऐसी अगर हुई, जो तुम्हारे जी को बुरी लगी, 
वो बयाँ से पहले ही भूलना, तुम्हे याद हो के न याद हो।


कभी हम में तुम में भी चाह थी, कभी हम से तुम से भी राह थी, 
कभी हम भी तुम भी थे आशना, तुम्हे याद हो के न याद हो।


वो जो लुत्फ़ मुझ पे थे बेशतर, वो करम के हाथ मेरे हाथ पर, 
मुझ सब है याद जरा-जरा, तुम्हे याद हो के न याद हो।


जिसे आप गिनते थे आशना, जिसे आप कहते थे बा-वफ़ा, 
मैं वही हूँ मोमिन'-ए- मुबतला, तुम्हे याद हो के न याद हो


मोमिन ख़ान मोमिन✍️

फ़लसफ़े इश्क़ में पेश आए सवालों की तरह

फ़लसफ़े इश्क़ में पेश आए सवालों की तरह 
हम परेशाँ ही रहे अपने ख़यालों की तरह

शीशागर बैठे रहे ज़िक्र-ए-मसीहा ले कर 
और हम टूट गए काँच के प्यालों की तरह

जब भी अंजाम-ए-मोहब्बत ने पुकारा ख़ुद को
वक़्त ने पेश किया हम को मिसालों की तरह

ज़िक्र जब होगा मोहब्बत में तबाही का कहीं 
याद हम आएँगे दुनिया को हवालों की तरह ।


सुदर्शन फ़ाकिर✍️

साँप को सर पर रखो या पाँव रखो साँप पर

 

साँप को सर पर रखो या पाँव रखो साँप पर, 
दंश का खतरा रहेगा सिर्फ अपने आप पर।

कुछ समय मन की उठी बेचैनियों को दीजिए, 
भाप पानी से उठेगी एक निश्चित ताप पर।

पैंट पीछे से फटी तो शर्ट बाहर कर लिया, 
मुफलिसी ढँकने में बेटा भी गया है बाप पर।

योजनों की दूरियाँ तो भूमिका में कट गई, 
रुक गई बाकी कहानी उँगलियों की नाप पर।

पत्थरों को पूजने में फूल सब तोड़े गए, 
जिंदगी सारी कटी है वक़्त के अभिशाप पर।

हाय हू हा हाय हू हा कर रहे हैं आज वो, 
लोग जो कल हँस रहे थे गैर के संताप पर।

पुण्य की कुछ पंक्तियों को स्वर्ण में ढाला गया, 
और चस्पा कर दिया सारे जहाँ के पाप पर ।


दिवाकर पाण्डेय 'चित्रगुप्त'✍️

Tuesday, March 31, 2026

खून आँसू बन गया आँखों में भर जाने के बाद

खून आँसू बन गया आँखों में भर जाने के बाद 
आप आए तो मगर तूफ़ाँ गुज़र जाने के बाद

चाँद का दुख बाँटने निकले हैं अब अहल-ए-वफ़ा 
रौशनी का सारा शीराज़ा बिखर जाने के बाद

होश क्या आया मुसलसल जल रहा हूँ हिज्र में 
इक सुनहरी रात का नश्शा उतर जाने के बाद

ज़ख़्म जो तुम ने दिया वो इस लिए रक्खा हरा
 ज़िंदगी में क्या बचेगा ज़ख़्म भर जाने के बाद

शाम होते ही चराग़ों से तुम्हारी गुफ़्तुगू 
हम बहुत मसरूफ़ हो जाते हैं घर जाने के बाद

ज़िंदगी के नाम पर हम उमर भर जीते रहे 
ज़िंदगी को हम ने पाया भी तो मर जाने के बाद ।


अज़्म शाकिरी✍️

बीमार को मरज़ की दवा देनी चाहिए

बीमार को मरज़ की दवा देनी चाहिए 
मैं पीना चाहता हूँ पिला देनी चाहिए

अल्लाह बरकतों से नवाज़ेगा इश्क़ में 
है जितनी पूँजी पास लगा देनी चाहिए

दिल भी किसी फ़क़ीर के हुजरे से कम नहीं 
दुनिया यहीं पे ला के छुपा देनी चाहिए

मैं खुद भी करना चाहता हूँ अपना सामना 
तुझ को भी अब नक़ाब उठा देनी चाहिए

मैं फूल हूँ तो फूल को गुल-दान हो नसीब 
मैं आग हूँ तो आग बुझा देनी चाहिए ।


राहत इंदौरी ✍️

दुनिया की रिवायात से बेगाना नहीं हूँ


दुनिया की रिवायात से बेगाना नहीं हूँ 
छेड़ो न मुझे मैं कोई दीवाना नहीं हूँ

इस कसरत-ए-ग़म पर भी मुझे हसरत-ए-ग़म है 
जो भर के छलक जाए वो पैमाना नहीं हूँ

रूदाद-ए-ग़म-ए-इश्क़ है ताजा मिरे दम से 
उनवान-ए-हर-अफ़्साना हूँ अफ़साना नहीं हूँ

इल्ज़ाम-ए-जुनूँ दें न मुझे अहल-ए-मोहब्बत 
मैं खुद ये समझाता हूँ कि दीवाना नहीं हूँ

मैं काएल-ए-ख़ुद्दारी-ए-उलकत सही लेकिन 
आदाब-ए-मोहब्बत से तो बेगाना नहीं हूँ

है बर्क-ए-सर-ए-तूर से दिल शोला-ब-दामाँ 
शम-ए-सर-ए-महफ़िल हूँ में परवाना नहीं हूँ

है गर्दिश-ए-सारार मिरी तक़दीर का चक्कर 
मोहताज-ए-तवाफ़-ए-दर-ए-मय-खाना नहीं हूँ

काँटों से गुज़र जाता हूँ दामन को बचा कर 
फूलों की सियासत से मैं बेगाना नहीं हूँ

लज़्ज़त-कश-ए-नज़्ज़ारा 'शकील' अपनी नज़र है 
महरूम-ए-जमाल-ए-रुख-ए-जानाना नहीं हूँ ।


शकील बदायूंनी ✍️ 

Sunday, March 29, 2026

ਸਬਰੋਜ ਗੁਜਰਦਾ ਹੈ ਜਦੋਂ ਮੇਰਾ ਬੇਵਫ਼ਾ ਯਾਰ ਦੀ ਤੁਰਬਤ ਤੇ



ਸਬਰੋਜ ਗੁਜਰਦਾ ਹੈ ਜਦੋਂ ਮੇਰਾ  ਬੇਵਫ਼ਾ ਯਾਰ ਦੀ  ਤੁਰਬਤ  ਤੇ 
ਮਯ' ਚ ਮਿਲਾ ਕੇ ਪੀ ਲੈਂਦਾ ਹਾਂ ਗ਼ਮ ਸਾਰੇ ਆਪਣੀ ਮੁਹੱਬਤ ਦੇ

ਯਾਦ  ਉਹਦੀ  ਜਦੋਂ ਵੀ ਦਸਤਕ ਦੇਂਦੀ ਹੈ ਮੇਰੇ ਦਿਲ ਦੇ  ਬੂਹੇ ਤੇ 
ਝੋਲੀ ਉਸ ਦੀ ਪਾ ਦੇਂਦਾ ਹਾਂ ਡਿਗਦੇ ਅੱਥਰੂ ਆਪਣੀ ਮੁਹੱਬਤ ਦੇ

ਜਦੋਂ  ਕੈਦੋਂ ਬਣ  ਕੋਈ ਕਰੀਬੀ ਵਰਤਾਉਂਦਾ ਹੈ  ਕਹਿਰ ਦਿਲ੍ਹਾ ਤੇ 
ਰਾਂਝੇ  ਜੋਗੀ ਬਣ  ਨਿਭਾਉਂਦੇ ਨੇ  ਕੀਤੇ ਵਾਦੇ  ਇਸ਼ਕ ਮੁਹੱਬਤ ਦੇ

ਬੜੀ ਸ਼ਿੱਦਤ ਨਾਲ ਯਾਰੋ ਨਿਭਾ ਰਿਹਾਂ ਹਾਂ ਮੈਂ ਰੀਤ  ਪਿਆਰ ਦੀ 
ਫ਼ਰਜ ਜੋ  ਅਦਾ ਕਰਨੇ  ਨੇ ਮੈਂ  ਆਪਣੀ ਵਫ਼ਾ ਪਾਕ ਮੁਹੱਬਤ  ਦੇ

ਤਾਰੇ ਵੀ  ਜਦੋਂ ਰਲ  ਬਹਿੰਦੇ ਨੇ  ਮੇਰੀ ਗ਼ਮਾ ਦੀ ਮਹਫ਼ਿਲ  ਵਿੱਚ 
ਕਾਲੀ ਰਾਤ ਦੀ ਬੁੱਕਲ ਵਿੱਚ ਰਲ ਗਾਉਂਦੇ ਨੇ ਰਾਗ ਮੁਹੱਬਤ ਦੇ ।


ਗੁਰਿੰਦਰ ਸਿੰਘ ✍️ 

Saturday, March 28, 2026

ਅੱਖਾਂ ਦੇ ਵਿੱਚ ਯਾਰ ਵਸਾ ਕੇ ਵੇਖ ਲਿਆ ਏ

ਚੁੰਨੀ ਦਾ ਮੈਂ ਜਾਲ ਬਣਾ ਕੇ ਵੇਖ ਲਿਆ ਏ
ਉਹਦੇ ਸੌ ਸੌ ਤਰਲੇ ਪਾ ਕੇ ਵੇਖ ਲਿਆ ਏ

ਉਹਦੀ ਕੰਡ ਸੀ ਨਾਲੇ ਹਾਸੇ ਡੁਲ੍ਹਦੇ ਸਨ
ਮੈਂ ਵੀ ਕੱਚੇ ਘੜੇ ਤੇ ਜਾ ਕੇ ਵੇਖ ਲਿਆ ਏ

ਜਿੰਨ, ਚੁੜੇਲ ਤੇ ਭੂਤ ਡਰਾਮਾ ਕਰ ਕੇ ਮੈਂ
ਰੌਲਾ ਪਾ ਕੇ, ਚੰਮ ਲੁਹਾ ਕੇ ਵੇਖ ਲਿਆ ਏ

ਪੋਹ ਦੇ ਚੰਨ ਨੂੰ ਤੱਕਣਾ ਸੌਖਾ ਕੰਮ ਤੇ ਨਹੀਂ
ਖੁੱਲ੍ਹੇ ਘਰ ਦੀ ਛੱਤ ਤੇ ਜਾ ਕੇ ਵੇਖ ਲਿਆ ਏ

ਲੀਕੋ ਲੀਕੀ ਮੱਥਾ ਖੱਪਾਂ ਪਾ ਦਿੰਦਾ ਏ
ਚੁੱਪ ਦੇ ਅੰਦਰ ਭੇਦ ਲੁਕਾ ਕੇ ਵੇਖ ਲਿਆ ਏ

ਉੱਚੀ ਬੋਲਿਆਂ ਲੋਕੀਂ ਪਾਗ਼ਲ ਕਹਿੰਦੇ ਨੇ
ਧੜਕਣ ਨੂੰ ਆਵਾਜ਼ ਬਣਾ ਕੇ ਵੇਖ ਲਿਆ ਏ

ਮੇਰੇ ਤੇ ਅਲਮਾਸ ਬਸ਼ਾਰਤ ਉਤਰੇਗੀ
ਅੱਖਾਂ ਦੇ ਵਿੱਚ ਯਾਰ ਵਸਾ ਕੇ ਵੇਖ ਲਿਆ ਏ ।


ਸਾਇਮਾ ਅਲਮਾਸ ਮਸਰੂਰ✍️