Friday, March 27, 2026

परिभाषित के दरबार में

सभी जाग्रत जीव
जिनकी रगों के घोड़े
माँद पर बँधे ध्यानरत खाते होंगे संतुलित-पुष्ट घास
विचार करेंगे
उन सभी पशुओं की नियति पर
जिनके खुर नहीं आते उनके वश में

वे ईश्वर को सलाह देंगे
कि ये बैल, ये भैंस, ये कुत्ता, ये बिल्ली
ये चूहा, ये हिरन, ये लोमड़ी
ये सब दरअसल जंगल के जानवर हैं
कि इनके विकास के लिए कोई विज्ञान रचा जाए


वे सब—
परिस्थितियाँ और मन:स्थितियाँ होंगी जिनकी चेरी
जिन्होंने किए होंगे सारे कोर्स
और शानदार ढंग से पाई होगी शिक्षा
कि कैसे रखें क़ाबू में कच्ची उर्जाओं को
कि कैसे निबटें ठाँठे मारती इस पशु ताक़त से
जो हुक्म देती भी नहीं, हुक्म लेती भी नहीं
इसे उत्पादन में कैसे जोतें
वे सब एक दिन वहाँ बैठेंगे सिर जोड़कर
और ईश्वर को सलाह देंगे
कि थोड़ी छूट देकर देखें
कि विज्ञान यह भी कहता है
कि थोड़ी आज़ादी दो तो जानवर आसान हो जाता है

एक दिन
जब समाज में रहने की शर्त
सिर्फ़ हाज़िरजवाबी कह दी जाएगी
अख़बारों और टी.वी. के सारे नायक
बादलों की तरह घिर आएँगे
और चिड़ियाघर के सब जानवरों को
रेल की नंगी पटरी पर दौड़ाएँगे
और असहमतों, हिजड़ों, समलैंगिकों और बिलों में रहने वाले कीड़ों को
खींच-खींचकर बाहर निकालेंगे
और आख़िरी बयान माँगेंगे
कहेंगे कि चुप नहीं रहना
कितनी भी झूठी हो, मगर भाषा में कहना
ऐसी कोई बात जिससे होड़ निखरे
जान आए मैदान में
—अपनी सबसे प्रेरक ईर्ष्या के बारे में बताओ
—अपना सबसे हसीन चुटकुला सुनाओ
हवा में घुला हुआ गैंडा
एक दिन उतरेगा रेत पर
और वोटरलिस्ट से नाम काटता जाएगा
पागलों के, भिखारियों के, और पुलों के नीचे रहने वाले असंख्यकों के
और जाकर बताएगा ईश्वर को
कि सरकारें चुनने का हक़ भी उसी को
जो बीचोंबीच रह सकता हो
न गुम हो जाता हो
अपनी ही नसों के जंगल में
न डूब जाता हो अपने ही ख़ून के ज्वार में
एक दिन वे बैठेंगे वहाँ और दुनिया की सफ़ाई पर विचार
करेंगे। 


आर. चेतन क्रांतिकारी ✍️ 

दस हज़ार की नौकरी और दांपत्य जीवन की एक सफल रात

अक्सर यह गुम रहती है
पीली, गुलाबी, हरी, नीली या जाने किस रंग की एक लट की तरह

उस धूसर सफ़ेद में
जो सात रंगों के मंथन में सबसे अंत में निकलता है...

और
सबसे अंत तक रहता है...

आप अगर ढूँढ़ने निकलें तो इसे नहीं पा सकते
लेकिन कभी-कभी अकस्मात् यह घटित हो जाती है

ज़ाहिर है पूर्वजन्मों के सद्कर्मों और वर्तमान में अर्जित
वस्तुगत आत्मविश्वास की इसमें बड़ी भूमिका होती है

यह कहानी ऐसी ही एक गुमशुदा रात की है
जो शाम छह बजे शुरू हुई, और कुम्हार के चक्के की तरह सुबह छह बजे तक धुआँधार चली

बेशक जो आपके सामने आएँगे, वे चित्र उस रफ़्तार का पता नहीं देते
जो अक्सर ठोस और धारदार चित्रों के पीछे अकेली
 सिर धुनती रहती है 


एक


आप देख रहे हैं
यह एक पत्नी है
सवेरेवाली गाड़ी जिससे छूट गई थी
पूरा दिन इसने अभारतीय काम-कल्पनाओं
और बच्चे के सहारे काटा

अब सूरज डूब रहा है
सुबह जिनको जाते देखा था
अब वे आते दिख रहे हैं
ख़ुशी-ख़ुशी धक्का-मुक्का करते हुए
वे अपनी ज़मीनों और गलियों में उतर रहे हैं


देखिए पति भी आ रहा है
उसकी कुहनी ख़ंजर है और पीठ ढाल
लेकिन यह तो रोज़ ही होता है
आज उसके हाथ में एक तरबूज भी है
गर्मियों का फल जो शीतलता देता है
लेकिन सिर्फ़ यही नहीं
नि:संदेह आज उसके पास कुछ और भी है
देखिए
पत्नी के प्रेमियों से
आज वह ज़रा भी घबराया नहीं
सारे उसकी बग़ल से बिना सिर उठाए गुज़र गए
वह भी, वह भी... और वह भी जिसके बिना मुन्ना एक पल नहीं ठहरता ।


दो


रात बरसों की सोई भावनाओं की तरह जाग रही है
और नींद में छेड़े साँप की तरह
कुंडली कस रही है...
पत्नी जैसा कि आप देख ही चुके हैं
अभी खूँटा तुड़ाने पर आमादा थी,
धीरे-धीरे लौट रही है...
उसके भीतर उस मुर्ग़े के पंख एक-एक उतरकर
तह जमा रहे हैं जो रोज़ पिछले रोज़ से एक फ़ुट ज़्यादा उड़ता है
और हवा में मारा जाता है,
अगले दिन फिर उड़ता है और फिर मारा जाता है

संकुचित, सलज्ज और बिद्ध... मादा ‘बाक़ी कल’ के लिए सुरक्षित हो
अभी अपने प्रकृति-प्रदत्त नर के लिए तैयार हो रही है...

देखो
पति आज टहल नहीं रहा
बैठा घूरता है
उसकी नंगी जाँघों पर तरबूज और हाथ में चाक़ू है
आँखों में आमंत्रण
जिसे आज कोई नहीं ठुकरा सकता
इस आमंत्रण के बारे में सुनते हैं कि
जिनके पूर्वजों ने एक हज़ार साल सतत् त्राटक किया हो...
यह उन्हीं की आँखों में होता है

पत्नी आख़िरी सीढ़ी पर आ चुकी है
बैठती है
वह कंघी से अपने पाप बुहार रही है,
जिनको उसने
दिन-भर सोच-सोचकर अर्जित किया था
पूर्णिमा का चाँद ठीक ऊपर चक्के की तरह घूम रहा है
घूँ... घूँ... घूँ...
पति को छुटपन से चाँद का शौक़ रहा है
घूमता चाँद उसकी आदिम इच्छाओं को जगाया करता है ।


तीन


स्त्री के भीतर चाँदनी का ज्वार उठ रहा है
स्वच्छ, धवल, शुभ्र पतिव्रत का कीटाणुनाशक फेन
उसकी देह के किनारों से
फकफकाकर उड़ रहा है, जैसे हाँडी से दाल
पुरुष चीख़ता है और चाँद को देखकर
कहता है... शुक्रिया दिल्ली!
कहीं कुछ गरज रहा है
मगर यहाँ शांति है
बहुत तेज़ लहरें हैं और
शीशे की भारी पेंदेवाली नाव धीरे-धीरे डोल रही है


हवा के खसखसी पर्दे में एक कहानी बूँद-बूँद उतर रही है।
यह विजयगाथा है पुरुष की
पिघले मोम की तरह वह
ठहर-ठहरकर उतर रही है
और
स्त्री मोटे कपड़े की तरह उसे सोख रही है
और वेतन दस हज़ार
मंजू मुझे यक़ीन था, यक़ीन है और यक़ीन रहेगा
तुम ऐसे नहीं जा सकतीं
एक फ़्रिज और एक कूलर का अभाव
और दिल्ली,
हमारे प्यार को नहीं खा सकते
जब तक मैं हूँ
हूँ... हूँ... हूँ... हूँ...
चील की तरह आकाश में पहुँची
और बग़ुले की तरह हौले-हौले उतरी स्त्री के ऊपर यह हुंकार
बिल्ली का नवजात बच्चा
जैसे अपने नंगे, गुलाबी गोश्त से साँस लेता है
वैसे ही पत्नी
रोमछिद्रों से इसे ग्रहण करती है
‘नाक, कान और आँख
ये कितनी पुरानी चीज़ें हैं जीवन के मुक़ाबले’—वह कहती है
और खुल जाती है
‘सफल पति का प्यार’
तारें भरे आसमान में मस्ती से टहलते हुए वह
अपने आपसे कहती है
‘सचमुच 
इस कालातीत अनुभव के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं, मित्रो’ ।


चार


पूरब में पौ फट रही है और
दिलों में दो-दो नई, हरी पत्तियाँ सशंक उठ खड़ी हुई हैं
पुरुष सूरज के लाल गोले को जाँघों पर रखता है
और उसमें से एक चौकोर टुकड़ा काटकर
पत्नी को देता है
...चखो, अब यह हमारा है
यह सब कुछ हमारा है
स्त्री का क्षण-क्षण आकार बदलता मांस
पति की देह में नए सिरे से जड़ें ढूँढ़ता है

तरबूज के गूदे से लथपथ दो नंगे बदन
गली के ऊपर मुँडेर पर आते हैं
उजली हवा में थरथराते हैं
भयभीत जनसाधारण की पुतलियों में सरसराते हैं
और एक-दूसरे को हँसी देते हुए कहते हैं
अब यह सभी कुछ हमारा है ।


क्रॉसड्रेसर

कुछ काम मैंने औरतों की तरह किए
कुछ नहीं, कई
और फिर धीरे-धीरे सारे


सबसे आख़िर में जब मैं लिखने बैठा
मैंने कमर सीधी खड़ी करके
पंजों और एड़ियों को सीध में रखकर बैठना सीखा
इससे कूल्हों को जगह मिली
और पेट को आराम
उसने बाहर की तरफ़ ज़ोर लगाना बंद कर दिया

अब मैं अपने शफ़्फ़ाफ़ नाख़ूनों को
आईने की तरह देख सकता था
और उँगलियों को
जो अब वनस्पति जगत का हिस्सा लग रही थीं

नहीं, मुझे फिर से शुरू करने दें
मैंने पहले औरतों को देखा
उनकी ख़ुशबू को उनकी आभा को
जो उनके उठकर चले जाने के बाद कुछ देर
वहीं रह जाती थी
उनके कपड़ों को
जिसमें वे बिल्कुल अलग दिखती थीं
मैंने बहुत सारी सुंदर लड़कियों को देखा, और उनसे नहीं
उनके आस-पास होते रहने को प्यार किया,
और फिर धीरे-धीरे नाख़ून पॉलिश को
लिपिस्टिक को
पायल को
कंगन को
गलहार को
कमरबंद को
और ऊँची एड़ी वाले सैंडिल को

उन तमाम चीज़ों को जो सिर्फ़ औरतों के लिए थीं
और जो उन्हें मर्दों के बावजूद बनाती थीं
मर्द जो मुझे नहीं पता किसलिए
बदसूरती को ताक़त का बाना कहता था
और ताक़त को देह का धर्म

मैंने बहुत सारे मर्दों को देखा
जब मेरे पास देखने के लिए सिर्फ़ वही रह गए थे
वे मोटरसाइकिल चला रहे थे
जो तीर की तरह तुम्हारे भीतर से निकलती थी
वे कविता भी लिख रहे थे
और उसे भी कुछ दिन बाद मोटरसाइकिल बना लेते थे
वे हर जगह कुछ न कुछ चलाते थे
जैसे संभोग में शिश्न को और दुनिया में हुकूमत को। 

मैंने उन्हें ख़ूब देखा
जब वे बलात्कार कर रहे थे
गर्भ चीर रहे थे
होंठों और योनियों को भालों से दो फाड़ कर रहे थे

मैंने उन्हें औरत होकर देखा
डरकर सहमते चुप रहते हुए
और उनके मामूलीपन को जानकर भी
कुछ न कहते हुए

नहीं, मैं फिर भटक गया
मुझे मर्दों की बात ही नहीं करनी थी
मुझे थोड़े कम मर्दों की बात करनी थी
जैसा मैं था

और वे तमाम और जो मेरे जैसे थे
मुझे उनकी बात करनी थी
जो अपने मर्द होने से उकता उठे थे
मर्दानगी की ठसक पर जिन्हें मंद-मंद औरताना हँसी आने लगी थी
जो औरतों की सुंदरता के शिकार हो गए थे
प्रेमी नहीं

उन्होंने उस सुंदरता को ओढ़ लेना चाहा
अपने काँटों-कैक्टसों के ऊपर,
उन्होंने अपने कोनों को घिसा, गोल किया
और उन पर रंग लगाए, अलग-अलग कई-कई
और ध्वनियाँ कर्णप्रिय रूणुन-झुणुन और कणन-मणन

मैंने एक स्कर्ट ख़रीदी जो कानों में कुछ कहती थी
एक साड़ी जिसका न आर था, न पार
एक जोड़ा रेशम के गुच्छे
जिसमें मुझे अपना गोपनीय रखना था
मैं यहीं रुक जाता अगर मुझे आगे रास्ता न दिखता
पर वहाँ एक राह थी जो आगे जाती थी
वहाँ जहाँ स्त्री थी
किसी दिन यूँ ही भूख की पस्ती में
वह मुझे अपने भीतर से आती लगी
फिर इसी तरह जब मैं बेमक़सद घूमने निकल गया
और शहर की आपाधापी में जा फँसा
मुझे वापस अपने पीछे कहीं दूर अँधेरे के बाद एक उजास-सी लगी
हालाँकि भीड़ इतनी थी कि मैं गर्दन घुमा नहीं सकता था

वह मुझे दिखी
जिस सुबह मैं देर तक सिगरेट पीना भूल रहा
और रक्त बिना मुझे बताए
मेरी शिराओं को जगाने मेरे स्नायुओं को जिलाने लगा
मैंने अचानक टाँगें महसूस कीं
जो अन्यथा धुएँ की गर्द में गुम रहती थीं
और मैं जानता नहीं था कि वे मेरे लिए क्या करती हैं।

वह मुझे दिखी
स्कर्ट की तहों से
साड़ी की चुन्नटों में सरसराती
गुनगुनाती अपने कान के, नाक के, पिंडलियों के घुँघरुओं में
फिर इस सवाल को अनदेखा कर
कि पहले स्त्री-देह बनी
या स्त्री देह के वस्त्र
घबराकर मैंने सिगरेट पी
और दफ़्तर चला गया

यह अंत था,
या शायद नहीं,
फिर भी एक बार के लिए इतना औरत होना काफ़ी था।


आर. चेतन क्रांतिकारी ✍️

हिंदू देश में यौन-क्रांति

मर्दों ने मान लिया था
कि उन्हें औरतें बाँट दी गईं
और औरतों ने
कि उन्हें मर्द

इसके बाद विकास होना था
इसलिए
प्रेम और काम, और क्रोध और लालसा और स्पर्द्धा,
और हासिल करके दीवार पर टाँग देने के पवित्र इरादे के पालने में
बैठकर सब झूलने लगे
परिवारों में, परिवारों की शाखाओं में
कुलों और कुटुंबों में—जातियों-प्रजातियों में
विकास होने लगा
जंगलों-पहाड़ों को
म्याऊँ और दहाड़ों को
रौंदते हुए क्षितिज-पार जाने लगा
इतिहास के कूबड़ में
ढेरों-ढेर गोश्त जमा होने लगा
पत्थर की बोसीदा किताब से उठकर डायनासोर चलने लगा
कि यौवन ने मारी लात देश के कूबड़ पर और कहा—
रुकें, अब आगे का कुछ सफ़र हमें दे दें

पहले स्त्री उठी
जो सुंदर चीज़ों के अजायबघर में सबसे बड़ी सुंदरता थी
और कहा, कि पेडू में बँधा हुआ यह नाड़ा कसता है
कि क़ीमतों का टैग आप कहीं और टाँग लें महोदय 


इस अकड़ी काली, गोल गाँठ को अब मैं खोल रही हूँ
सुंदरता ने असहमति के प्रचार-पत्र पर
सोने की मुहर जैसा सुडौल अँगूठा छापा और नाम लिखा—अतृप्ति


कूबड़ थे जिनमें अकूत धन भरा था
कुएँ थे जिनमें लालसा की तली कहीं न दिखती थी
पर सुंदरता का दावा न था कि वह इस असमतलता को दूर करेगी
इरादों की ऋजुरैखिक यात्रा में वह थोड़ी अलग थी
उसने एक नई धरती की भराई शुरू की
जो सितारे की तरह दिखती थी
चाँद की तरह
जिसकी मिट्टी में गुरुत्व नहीं था
जिसके ऊपर, नीचे, दाएँ, बाएँ आसमान था
तो भी घर-घर में एक इच्छा जवान होती थी
कि बेशक अमेरिका के बाद ही
पर एक दिन हम भी वहाँ जाकर रहेंगे

आँगन-आँगन कामना का इस्पात घिसता था
बुझी-गीली राख में रात-दिन
और तश्तरी की धार तेज़ होती जा रही थी
तश्तरी घूमती थी और काटती थी
घूम-घूमकर काटती कतरती थी ककड़ियों-खरबूजों की तरह
हिंदू देश में हिंदुओं को

अपनी सांस्कृतिक दुविधाओं में खड़े
वे खच-खच कटते थे
अपनी विविधताओं में बुझे मोतियों से जड़े
धर्म के सुविधाजनक-उपेक्षित पिछवाड़े पड़े
वे चमार, लुहार, कुम्हार
ब्राह्मण, बनिये, सुनार

कहीं न थी पूरी तलवार
केवल धार
सड़क पर चिलचिलाती धूप में लहराती
निमिष-भर को दिखती
और खरबूजों-तरबूजों की तरह फले-फूले
और पाला खाई टहनियों-से सूखे-तिड़के
मर्दों के मेदे में उतर जाती
मनु का देश काँखता खड़ा रह जाता
और वह अगली धूप में पहुँच जाती
सारे पांडव, सारे कौरव, सारे राम, सारे रावण
अपने रचयिताओं को पुकारते युद्ध से बाहर हुए जाते थे
दूर खड़े अपने हथियार चमकारते
चरित्रवान आत्माओं को जगाते—कहते,
यौवन ने मचा दिया ध्वंस
कल तक कैसे शांत खड़ी लहराती थी संयम की फ़सल
आह, इतने आक्रामक तो न थे हिंदू आदर्श
ये तो रास्ता छेंककर खड़ी हो जाती है
ये कौंधती टाँगें,
ये सुतवाँ नितंब, ये घूरते स्तन, ये सोचती-सी नाभि
सर्वत्र प्रस्तुत—कि जैसे हाथ बढ़ाओ, छू लो, खा लो
पर इरादा कर बढ़ो तो... अरे सँभालो...
यही क्या हिंदू सौंदर्य है!

चकित थे हिंदू
बलात्कार की विधियाँ सोचते, घूरते, घात लगाए, चुपचाप देखते, सन्नद्ध
कि भीम के, द्रोण के देश में जनखापन छाया जाता है
कि एक ही आकृति में स्त्री आती है और पौरुष जाता है
कि दृश्य यह अद्भुत है
पूछते विधाता से हाथ जोड़कर प्रार्थना में
और शाखा में पवन-मुक्तासन बाँध
कर संचालक जी से—
कि इस दृश्य का लिंग क्या है, प्रभो ।


आर. चेतन क्रांति ✍️

सीलमपुर की लड़कियाँ...

सीलमपुर की लड़कियाँ ‘विटी’ हो गईं

लेकिन इससे पहले वे बूढ़ी हुई थीं
जन्म से लेकर पंद्रह साल की उम्र तक
उन्होंने सारा परिश्रम बूढ़े होने के लिए किया,
पंद्रह साल बुढ़ापा
जिसके सामने साठ साला बुढ़ापे की वासना
विनम्र होकर झुक जाती थी
और जुग-जुग जियो का जाप करने लगती थी

यह डॉक्टर मनमोहन सिंह और एम टी.वी. के उदय से पहले की बात है।
तब इन लड़कियों के लिए न देश-विदेश था, न काल-काल
ये दोनों
दो कूल्हे थे
दो गाल
और दो छातियाँ

बदन और वक़्त की हर हरकत यहाँ आकर
मांस के एक लोथड़े में बदल जाती थी
और बंदर के बच्चे की तरह एक तरफ़ लटक जाती थी

यह तब की बात है जब हौज़ख़ास से दिलशाद गार्डन जाने वाली
बस कंडक्टर
सीलमपुर में आकर रेज़गारी गिनने लगता था
फिर वक़्त ने करवट बदली
सुष्मिता सेन मिस यूनीवर्स बनीं
और ऐश्वर्या राय मिस वर्ल्ड
और अंजलि कपूर जो पेशे से वकील थीं
किसी पत्रिका में अपने अर्धनग्न चित्र छपने को दे आईं
और सीलमपुर, शाहदरे की बेटियों के
गालों, कूल्हों और छातियों पर लटके मांस के लोथड़े
सप्राण हो उठे
वे कबूतरों की तरह फड़फड़ाने लगे

पंद्रह साला इन लड़कियों की हज़ार साला पोपली आत्माएँ
अनजाने कंपनों, अनजानी आवाज़ों और अनजानी तस्वीरों से भर उठीं
और मेरी ये बेडौल पीठवाली बहनें
बुज़ुर्ग वासना की विनम्रता से
घर की दीवारों से
और गलियों-चौबारों से
एक साथ तटस्थ हो गईं 

जहाँ उनसे मुस्कुराने की उम्मीद थी
वहाँ वे स्तब्ध होने लगीं,
जहाँ उनसे मेहनत की उम्मीद थी
वहाँ वे यातना कमाने लगीं
जहाँ उनसे बोलने की उम्मीद थी
वहाँ वे सिर्फ़ अकुलाने लगीं
उनके मन के भीतर दरअसल एक क़ुतुबमीनार निर्माणाधीन थी
उनके और उनके माहौल के बीच
एक समतल मैदान निकल रहा था
जहाँ चौबीस घंटे खट्खट् हुआ करती थी।

यह उन दिनों की बात है जब अनिवासी भारतीयों ने
अपनी गोरी प्रेमिकाओं के ऊपर
हिंदुस्तानी दुलहिनों को तरजीह देना शुरू किया था
और बड़े-बड़े नौकरशाहों और नेताओं की बेटियों ने
अँग्रेज़ी पत्रकारों को चुपके से बताया था कि
एक दिन वे किसी न किसी अनिवासी के साथ उड़ जाएँगी
क्योंकि करियर के लिए यह ज़रूरी था
करियर जो आज़ादी था

उन्हीं दिनों यह हुआ
कि सीलमपुर के जो लड़के
प्रिया सिनेमा पर खड़े युद्ध की प्रतीक्षा कर रहे थे
वहाँ की सौंदर्यातीत उदासीनता से बिना लड़े ही पस्त हो गए
चौराहों पर लगी मूर्तियों की तरह
समय उन्हें भीतर से चाट गया
और वे वापसी की बसों में चढ़ लिए

उनके चेहरे खूँख़ार तेज़ से तप रहे थे
वे साकार चाक़ू थे,
वे साकार शिश्न थे
सीलमपुर उन्हें जज़्ब नहीं कर पाएगा
वे सोचते आ रहे थे
उन्हें उन मीनारों के बारे में पता नहीं था
जो इधर
लड़कियों की टाँगों में तराश दी गई थीं
और उस मैदान के बारे में
जो उन लड़कियों और उनके समय के बीच
जाने कहाँ से निकल आया था
इसलिए जब उनका पाँव उस ज़मीन पर पड़ा
जिसे उनका स्पर्श पाते ही धसक जाना चाहिए था
वे ठगे से रह गए

और लड़कियाँ हँस रही थीं
वे जाने कहाँ की बस का इंतज़ार कर रही थीं
और पता नहीं लगने दे रही थीं कि वे इंतज़ार कर रही हैं।


आर. चेतनक्रांति ✍️

मर्दानगी

पहला नियम तो ये था कि औरत रहे औरत,
फिर औरतों को जन्म देने से बचे औरत;
जाने से पहले अक़्ल-ए-मर्द ने कहा ये भी,
मर्दों की ऐशगाह में ख़िदमत करे औरत।

इतनी अदा के साथ जो आए ज़मीन पर,
कैसे भला वो पाँव भी रखे ज़मीन पर;
बिस्तर पे हक़ उसी का था बिस्तर उसे मिला,
ख़ादिम ही जाके बाद में सोए ज़मीन पर।

इस तरह खेल सिर्फ़ ताक़तों का रह गया,
एहसास का होना था, हिकमतों का रह गया;
सबको जो चाहिए था वो मर्दों ने ले लिया,
सबसे जो बच गया, वो औरतों का रह गया।

यूँ मर्द ने जाना कि है मर्दानगी क्या शै,
छाती की नाप, जाँघिए का बाँकपन क्या है;
बाँहों की मछलियों को जब हुल्कारता चला,
पीछे से फूल फेंक के देवों ने कहा जै।

बाद इसके जो भी साँस ले सकता था, मर्द था
जो बीच सड़क मूतता हगता था, मर्द था;
घुटनों के बल जो रेंगता था मर्द था वो भी,
पीछे खड़ा जो पाँव मसलता था, मर्द था।

कच्छा पहन के छत पे टहलता था, मर्द था
जो बेहिसाब गालियाँ बकता था, मर्द था;
बोतल जिसे बिठा के खिलाती थी रात को,
पर औरतों को देख किलकता था, मर्द था।

जो रेप भी कर ले, वो मर्द और ज़ियादा,
फिर कहके बिफ़र ले, वो मर्द और ज़ियादा;
चलती गली में कूद के दुश्मन की बहन को,
बाँहों में जो भर ले वो मर्द और ज़ियादा।

मर्दानगी को थाम के बीमार चल पड़े,
बूढ़े-जवान, नाकिसो-लाचार चल पड़े;
मर्दानगी के बाँस पे ही टाँग के झंडे,
करके वतन की देख-रेख यार चल पड़े। 


आर. चेतनक्रांति ✍️

रोटी और संसद

एक आदमी
रोटी बेलता है
एक आदमी रोटी खाता है
एक तीसरा आदमी भी है
जो न रोटी बेलता है, न रोटी खाता है
वह सिर्फ़ रोटी से खेलता है
मैं पूछता हूँ—
‘यह तीसरा आदमी कौन है?’
मेरे देश की संसद मौन है। 


धूमिल ✍️

मैं तुम्हें फिर मिलूँगी...

मैं तुम्हें फिर मिलूँगी
कहाँ? किस तरह? नहीं जानती
शायद तुम्हारे तख़्ईल की चिंगारी बन कर
तुम्हारी कैनवस पर उतरूँगी
या शायद तुम्हारी कैनवस के ऊपर
एक रहस्यमय रेखा बन कर
ख़ामोश तुम्हें देखती रहूँगी


या शायद सूरज की किरन बन कर
तुम्हारे रंगों में घुलूँगी
या रंगों की बाँहों में बैठ कर
तुम्हारे कैनवस को
पता नहीं कैसे-कहाँ?
पर तुम्हें ज़रूर मिलूँगी

या शायद एक चश्मा बनी होऊँगी
और जैसे झरनों का पानी उड़ता है
मैं पानी की बूँदें
तुम्हारे जिस्म पर मलूँगी
और एक ठंडक-सी बन कर
तुम्हारे सीने के साथ लिपटूँगी...
मैं और कुछ नहीं जानती
पर इतना जानती हूँ
कि वक़्त जो भी करेगा
इस जन्म मेरे साथ चलेगा...


यह जिस्म होता है
तो सब कुछ ख़त्म हो जाता है
पर चेतना के धागे
कायनाती कणों के होते हैं
मैं उन कणों को चुनूँगी
धागों को लपेटूँगी
और तुम्हें मैं फिर मिलूँगी... ।


अमृता प्रीतम ✍️
अनुवाद : अमिया कुँवर


संसद

ज़हरीली शहद की मक्खी की ओर उँगली न करें
जिसे आप छत्ता समझते हैं ।
वहाँ जनता के प्रतिनिधि बसते हैं ।

पाश ✍️ 

वक़्त आ गया है...

अब वक़्त आ गया है
कि आपसी रिश्ते का इक़बाल करें
और विचारों की लड़ाई
मच्छरदानी से बाहर निकलकर लड़ें
और प्रत्येक गिले की शर्म
सामने होकर झेलें

वक़्त आ गया है
कि अब उस लड़की को
जो प्रेमिका बनने से पहले ही
पत्नी बन गई, बहन कह दें
लहू के रिश्ते का व्याकरण बदलें
और मित्रों की नई पहचान करें
अपनी-अपनी रक्त की नदी को तैरकर पार करें
सूर्य को बदनामी से बचाने के लिए
हो सके तो रात-भर
ख़ुद जलें। 


पाश ✍️ 
अनुवाद: चमन लाल