Thursday, March 12, 2026

ਸੁਫ਼ਨੇ ਕੀ ਹੰਦੇ ਨੇ...

ਅਸਾਨੂੰ ਨਹੀ ਪਤਾ
ਸੁਫ਼ਨੇ ਕੀ ਹੰਦੇ ਨੇ

ਸੁਫ਼ਨੇ ਦੇਖਣਾ ਤੇ
ਉਹਨਾਂ ਨੂੰ ਸਾਕਾਰ ਕਰਨਾ
ਵੱਡੇ ਲੋਕਾਂ ਦਾ ਕੰਮ ਹੈ 

ਸਾਨੂੰ ਸੁਫ਼ਨੇ ਨਹੀ ਆਉਦੇਂ
ਸੁਫ਼ਨਿਆ ਲਈ ਜਰੂਰੀ ਹੈ
ਨੀਂਦ ਦਾ ਹੋਣਾ 

ਤੇ ਭੁੱਖੇ ਪੇਟ ਕਦੀ
ਨੀਂਦ ਨਹੀ ਆਂਉਦੀ 

ਸਾਨੂੰ ਨਹੀ ਪਤਾ
ਸੁਫ਼ਨੇ ਕੀ ਹੁੰਦੇ ਨੇ
ਸਾਨੂੰ ਸੁਫ਼ਨੇ ਨਹੀ ਆਂਉਦੇ ।

ਸਾਨੂੰ ਸੁਫ਼ਨੇ ਰਾਸ ਨਹੀ ਆਂਉਦੇ
ਦੋ ਡੰਗ ਦੀ ਰੋਟੀ ਦਾ ਸੁਫ਼ਨਾ
ਸਾਡੇ ਭੁੱਖੇ ਢਿੰਡਾ ਨੂੰ 
ਨਹੀ ਭਰ ਸਕਦਾ ।

ਸੁਫ਼ਨੇ ।
ਖੇਤ ਵਿੱਚ ਰੱਸੀ ਤੇ
ਲਟਕੇ ਹੋਏ ਗਰੀਬ ਕਿਸਾਨ ਦੇ
ਮੁਰਦਾ ਜਿਸਮ ਵਿੱਚ 
ਜਾਨ ਨਹੀ ਫੂਕ ਸਕਦੇ ।

ਸੁਫ਼ਨੇ ਸਾਡੇ ਕੁੱਝ ਨਹੀ ਲੱਗਦੇ
ਸਾਡੇ ਲਈ ਇਹ ਸਿਰਫ਼
ਬੰਦ ਅੱਖਾਂ ਨਾਲ ਵੇਖੇ
ਵਹਿਮ ਤੋਂ ਬਿੰਨਾ ਕੁੱਝ ਨਹੀ 

ਮੈਂ ਕਦੀ 
ਸੁਫ਼ਨੇ ਨਹੀ ਵੇਖੇ
ਮੈਂ ਤਾਂ ਵੇਖਿਆ ਹੈ
ਬੱਸ ਖੁੱਲੀਆਂ ਅੱਖਾਂ ਨਾਲ
ਸੁਪਨਿਆਂ ਨੂੰ ਚੂਰ ਚੂਰ ਹੁੰਦੇ

ਮੈਂ ਵੇਖਿਆ ਹੈ 
ਕਿਸੇ ਬੇਵਸ ਦੀ ਅੱਖ ਵਿੱਚੋਂ
ਟੱਪਕੇ ਹੋਏ ਸੁਪਨੇ ਨੂੰ 
ਧਰਤੀ ਵਿੱਚ ਸਮਾਂਉਦੇਂ ਹੋਏ

ਮੈਂ ਵੇਖਿਆ ਹੈ 
ਖੇਤਾਂ ਵਿੱਚ ਬੀਜੇ ਹੋਏ
ਸੁਪਨਿਆ ਨੂੰ ਜਵਾਨ ਹੁੰਦੇ
ਤੇ ਮੰਡੀਆ ਵਿੱਚ 
ਤੇ ਉਹਨਾਂ ਨੂੰ 
ਦਮ ਤੋੜਦੇ ਹੋਏ

ਮੈਂ ਵੇਖਿਆ ਹੈ
ਸੁਪਨਿਆ ਨੂੰ ਬੰਜਰ ਪਈ
ਜ਼ਮੀਨ ਉਪਰ 
ਸੁੱਕ ਕੇ ਤਰੇੜਾਂ ਖਾਏ ਹੋਏ
ਜਿੰਨਾਂ ਨੇ ਵੇਖਿਆ ਸੀ 
ਕਦੀ ਬਰਸਾਤ ਦਾ ਸੁਫ਼ਨਾ

ਮੈਂ ਵੇਖਿਆ ਹੈ
ਉਸ ਬੁੱਢੇ ਮਾਂ-ਬਾਪ ਦੀ
ਅੱਖਾਂ ਦੇ ਸੁਫ਼ਨੇ ਨੂੰ
ਸੁਫ਼ਨਾ ਹੁੰਦੇ ਹੋਏ
ਜਿਸ ਦੇ ਜਵਾਨ ਪੁੱਤਰ ਨੂੰ
ਝੂਠਾ ਦਹਿਸ਼ਤਗਰਦ 
ਸਾਬਿਤ ਕਰ 
ਗੋਲੀ ਮਾਰ ਦਿਤੀ ਗਈ

ਮੈਂ ਚਖਿਆ ਹੈ 
ਤਿੜਕੇ ਹੋਏ ਸੁਫ਼ਨਿਆ ਦੀ
ਨੰਗੇ ਪੈਰਾਂ ਵਿੱਚ ਚੋਭ ਦਾ ਦਰਦ

ਮੈਂ ਵੇਖਿਆ ਹੈ
ਸੁਫ਼ਨਿਆ ਦੇ ਧੂੜ ਦੇ ਕਣਾਂ
ਨੂੰ ਅੱਖਾਂ ਵਿੱਚ ਰੜਕਦੇ ਹੋਏ

ਸਾਨੂੰ ਸੁਫ਼ਨੇ ਨਹੀ ਆਂਉਦੇ
ਸਾਨੂੰ ਸੁਫ਼ਨੇ ਰਾਸ ਨਹੀ ਆਂਉਦੇ
ਖਾਲੀ ਪੇਟ ਸੁਫ਼ਨੇ ਨਹੀ ਆਂਉਦੇ...

ਅਮਰ ਸੰਘਰ ✍️

ਫੁਟਪਾਥ ਤੇ ਰਹਿੰਦੀ ਨਿੱਕੀ ਬੱਚੀ ....

ਡਰ ਜਾਂਦੀ ਹੈ 
ਕਮਰੇ ਦਾ ਨਾਮ ਸੁਣਦੇ ਹੀ 
ਫੁਟਪਾਥ ਤੇ ਰਹਿੰਦੀ
ਨਿੱਕੀ ਬੱਚੀ 

ਆਖਦੀ ਹੈ 
ਕਮਰੇ ਘਰ ਹੁੰਦੇ ਨੇ
ਤੇ ਕਮਰੇ ਮੰਦਿਰ-ਮਸਜਿਦ ਵੀ

ਪਰ ! 
ਕੁੱਝ ਕਮਰੇ 
ਵੇਸਵਾ ਦਾ ਕੋਠਾ ਵੀ ਹੁੰਦੇ ਨੇ
ਜਿਥੇ ਸਿਰ ਢਕਣ ਲਈ
ਛੱਤ ਤਾਂ ਮਿਲਦੀ ਹੈ
ਤਨ ਢਕਣ ਲਈ 
ਕੱਪੜਾ ਨਹੀਂ ।

ਅਮਰ ਸੰਘਰ ✍️

ਤੁਸੀ ਕੀ ਜਾਣੋਂ...

ਤੁਸੀ ਕੀ ਜਾਣੋਂ
ਕੀ ਹੁੰਦੀ ਹੈ 
ਮੁਰਝਾਏ ਹੋਏ ਫ਼ੁੱਲਾਂ ਦੀ 
ਮਹਿਕ !! 

ਤੁਸੀ 
ਕਦੀ ਨਹੀ ਜਾਣ ਸਕਦੇ
ਕੀ ਹੁੰਦਾਂ ਹੈ 
ਤੱਪਦੇ ਹੋਏ ਸੂਰਜ ਦੀ 
ਠੰਢਕ ਦਾ ਅਹਿਸਾਸ

ਕਿੰਨੇ ਸੋਹਣੇ ਹੁੰਦੇ ਨੇ
ਕੈਕਟਸ ਦੇ ਬੂਟੇ ਨੂੰ ਲੱਗੇ
ਨੁਕੀਲੇ ਕੰਢੇ ।

ਕਿੰਨੇ ਕੋਮਲ ਹੁੰਦੇ ਨੇ
ਕਿਸੇ ਮਹਿਨਤਕਸ਼ ਦੇ
ਝਰੀਟਾਂ ਲੱਗੇ ਜ਼ਖਮੀ ਹੱਥ

ਕਿੰਨਾਂ ਵੱਡਾ ਹੁੰਦਾਂ ਹੈ
ਗਰਮੀ ਚ ਝੁਲਸੇ ਹੋਏ 
ਸਰੀਰਾਂ ਅੰਦਰ ਦਿਲ ।

ਕਿੰਨਾ ਹੀ 
ਅਰਾਮਦੇਹ ਹੁੰਦਾ ਹੈ
ਨੰਗੇ ਪੈਰਾਂ ਵਿੱਚ ਖੂਭੇ ਹੋਏ
ਨੁਕੀਲੇ ਪੱਥਰ ਦੀ ਚੋਭ

ਕਿੰਨੀਆਂ ਹੀ
ਪਵਿਤਰ ਹੁੰਦੀ ਨੇ
ਇੱਕ ਕਿਰਤੀ ਦੇ ਜਿਸਮ
ਤੋਂ ਟੱਪਕਦੀਆਂ
ਖੂਨ, ਪਸੀਨੇ ਦੀਆਂ ਬੂੰਦਾਂ

ਨਹੀ ! 
ਤੁਸੀ ਇਹ ਕਦੀ ਨਹੀ 
ਜਾਣ ਪਾਉਗੇ

ਬੜਾ ਮੁਸ਼ਕਿਲ ਹੈ
ਤੁਹਾਡੇ ਬੰਜਰ ਹੋਏ ਦਿਲਾਂ ਲਈ
ਇਹ ਸਭ ਜਾਣ ਪਾਉਣਾ

ਕਿਉਕੀ ਬੰਜਰ ਹੋਈਆ 
ਜਮੀਨਾਂ ਉਪਰ ਫ਼ੁੱਲ ਨਹੀ ਖਿਲਦੇ
ਜਿੰਨਾ ਦੀ ਮਹਿਕ ਤੁਸੀ ਮਾਣ ਸਕੋ

ਏ.ਸੀ ਕਾਰਾਂ ਤੇ ਏ.ਸੀ 
ਕਮਰਿਆ ਵਿੱਚ ਬੈਠੇ 
ਪਸੀਨਾਂ ਨਹੀ ਆਉਦਾਂ
ਇਸ ਲਈ ਤੁਸੀ ਨਹੀ ਜਾਣ ਪਾਉਗੇ
ਕਦੀ ਵੀ ਖੂਨ ਪਸੀਨੇ ਦੀ 
ਪਵਿਤਰਤਾ 

ਤੁਸੀ ਨਹੀ ਜਾਣ ਪਾਉਗੇ
ਪੈਰਾਂ ਵਿੱਚ ਖੂਭੇ ਹੋਏ 
ਪੱਥਰ ਦੀ ਚੋਭ ਦਾ ਅਰਾਮਦੇਹ ਦਰਦ
ਕਿਉਕੀ ਧਰਤੀ ਤੇ ਪੈਰ ਰੱਖਣਾਂ 
ਤੁਹਾਡੇ ਕਾਰਾਂ ਵਾਲਿਆਂ ਦੀ ਸ਼ਾਨ ਦੇ ਖਿਲਾਫ਼ ਹੈ ।

ਤੁਹਾਡੇ ਕਠੋਰ ਹੱਥ
ਤਾਂ ਬਸ ਖੋਹਣ ਜਾਣਦੇ ਨੇ
ਸਾਡੇ ਹੱਕਾਂ ਤੇ ਸਾਡੀ ਕਮਾਈ ਨੂੰ

ਪੈਸੇ ਦੀ ਗੱਠੀਆਂ 
ਗਿਣਨ ਵਾਲੇ ਹੱਥ 
ਇਹ ਕਦੀ ਨਹੀ ਜਾਣ ਸਕਦੇ 
ਕਿ ਕਿੰਨੇ ਕੋਮਲ ਹੁੰਦੇ ਨੇ
ਕਿਰਤੀ ਦੇ ਹੱਥ 

ਨਹੀ ਤੁਸੀ ਕੁੱਝ ਨਹੀ 
ਜਾਣ ਸਕਦੇ... 

ਅਮਰ ਸੰਘਰ✍️

Tuesday, March 10, 2026

इक हुनर है जो कर गया हूँ मैं...

इक हुनर है जो कर गया हूँ मैं
सब के दिल से उतर गया हूँ मैं

कैसे अपनी हँसी को ज़ब्त करूँ
सुन रहा हूँ कि घर गया हूँ मैं

क्या बताऊँ कि मर नहीं पाता
जीते-जी जब से मर गया हूँ मैं

अब है बस अपना सामना दर-पेश
हर किसी से गुज़र गया हूँ मैं

वही नाज़-ओ-अदा वही ग़म्ज़े
सर-ब-सर आप पर गया हूँ मैं

अजब इल्ज़ाम हूँ ज़माने का
कि यहाँ सब के सर गया हूँ मैं

कभी ख़ुद तक पहुँच नहीं पाया
जब कि वाँ उम्र भर गया हूँ मैं

तुम से जानाँ मिला हूँ जिस दिन से
बे-तरह ख़ुद से डर गया हूँ मैं

कू-ए-जानाँ में सोग बरपा है

कि अचानक सुधर गया हूँ मैं ।


जौन एलिया ✍️ 

मिरे हम-नफ़स मिरे हम-नवा मुझे दोस्त बन के दग़ा न दे...

मिरे हम-नफ़स मिरे हम-नवा मुझे दोस्त बन के दग़ा न दे
मैं हूँ दर्द-ए-'इश्क़ से जाँ-ब-लब मुझे ज़िंदगी की दु'आ न दे

मिरे दाग़-ए-दिल से है रौशनी इसी रौशनी से है ज़िंदगी
मुझे डर है ऐ मिरे चारा-गर ये चराग़ तू ही बुझा न दे

मुझे छोड़ दे मिरे हाल पर तिरा क्या भरोसा है चारा-गर
ये तिरी नवाज़िश-ए-मुख़्तसर मिरा दर्द और बढ़ा न दे

मिरा 'अज़्म इतना बुलंद है कि पराए शो'लों का डर नहीं
मुझे ख़ौफ़ आतिश-ए-गुल से है ये कहीं चमन को जला न दे

वो उठे हैं ले के ख़ुम-ओ-सुबू अरे ओ 'शकील' कहाँ है तू
तिरा जाम लेने को बज़्म में कोई और हाथ बढ़ा न दे ।


शकील बदायूंनी ✍️ 

मुझे दोस्त बन के दग़ा न दे...

मेरे हम-नफ़स, मेरे हम-नवा, 
मुझे दोस्त बन के दग़ा न दे
मैं हूँ दर्द-ए-इश्क़ से जाँ-बलब, 
मुझे ज़िन्दगी की दुआ न दे

मुझे छोड़ दे मेरे हाल पर, 
तेरा क्या भरोसा है चारागर
ये नगीज़-ए-शब-ए-फ़िराक़ है, 
इसे तू ही अब  न बढ़ा न दे
मुझे दोस्त बन के दग़ा न दे...मेरे हम-नफ़स...

जिसे कह दिया तू ने ज़हर-ए-ग़म, 
तो हमीं ने पी ली हँस के हम
जो कहा तू ने ये ज़हर है, 
तो मुझे न ज़हर-ए-वफ़ा न दे
मुझे दोस्त बन के दग़ा न दे...मेरे हम-नफ़स...

मैं हूँ दर्द-ए-इश्क़ से जाँ-बलब...
जो कहा तू ने ये ज़हर है, 
तो मुझे न ज़हर-ए-वफ़ा न दे
मेरे हम-नफ़स, मेरे हम-नवा, 
मुझे दोस्त बन के दग़ा न दे ।


शकील बदायूंनी ✍️

Friday, March 6, 2026

अपने चेहरे से जो ज़ाहिर है छुपाएँ कैसे....










अपने चेहरे से जो ज़ाहिर है छुपाएँ कैसे
तेरी मर्ज़ी के मुताबिक़ नज़र आएँ कैसे 

घर सजाने का तसव्वुर तो बहुत ब'अद का है 
पहले ये तय हो कि इस घर को बचाएँ कैसे 

लाख तलवारें बढ़ी आती हों गर्दन की तरफ़ 
सर झुकाना नहीं आता तो झुकाएँ कैसे 

क़हक़हा आँख का बरताव बदल देता है 
हँसने वाले तुझे आँसू नज़र आएँ कैसे 

फूल से रंग जुदा होना कोई खेल नहीं 
अपनी मिट्टी को कहीं छोड़ के जाएँ कैसे 

कोई अपनी ही नज़र से तो हमें देखेगा 
एक क़तरे को समुंदर नज़र आएँ कैसे 

जिस ने दानिस्ता किया हो नज़र-अंदाज़ 'वसीम' 
उस को कुछ याद दिलाएँ तो दिलाएँ कैसे ।

        

वसीम 'बरेलवी' ✍️

Thursday, March 5, 2026

मंटो की वो 5 कहानियाँ जिन पर मुक़द्दमे




मंटो की कहानियों को समझे बिना उन पर अश्लीलता का आरोप लगाया जाता रहा है। यहाँ तक कि उनकी कई कहानियों पर मुक़द्दमे भी चले और उन्हें अदालत में हाज़िर होना पड़ा। जबकि उन कहानियों में मंटो ने मानव मन के पोशीदा हिस्से तक रसाई हासिल कर के उन गुत्थियों को सुलझाने की कोशिश की है जो किसी आम इंसान या मामूली रचनाकार की पहुँच से बाहर है। 

  • ठंडा गोश्त
  • खोल दो
  • काली शलवार
  • बू
  • धुआ

धुआँ

 सआदत हसन मंटो ✍️ 

स्टोरीलाइन

यह कहानी वयस्कता के मनोविज्ञान पर आधारित है। एक ऐसे बच्चे की भावनाओं को चित्रित किया गया है जो कामोत्तेजना की दहलीज़ पर क़दम रख रहा है और वह अपने अंदर होने वाले बदलाव को महसूस तो कर रहा है मगर समझ नहीं पा रहा है। त्रास्दी ये है कि उसकी भावनाओं को सही दिशा देने वाला कोई नहीं है।




धुआं 


वो जब स्कूल की तरफ़ रवाना हुआ तो उसने रास्ते में एक क़साई देखा, जिसके सर पर एक बहुत बड़ा टोकरा था। उस टोकरे में दो ताज़ा ज़बह किए हुए बकरे थे खालें उतरी हुई थीं, और उनके नंगे गोश्त में से धुआँ उठ रहा था। जगह जगह पर ये गोश्त जिसको देख कर मसऊद के ठंडे गालों पर गर्मी की लहरें सी दौड़ जाती थीं, फड़क रहा था जैसे कभी कभी उसकी आँख फड़का करती थी।

उस वक़्त सवा नौ बजे होंगे मगर झुके हुए ख़ाकसतरी बादलों के बाइस ऐसा मालूम होता था कि बहुत सवेरा है। सर्दी में शिद्दत नहीं थी, लेकिन राह चलते आदमियों के मुँह से गर्म-गर्म समावार की टोंटियों की तरह गाढ़ा सफ़ेद धुआँ निकल रहा था। हर शय बोझल दिखाई देती थी जैसे बादलों के वज़न के नीचे दबी हुई है। मौसम कुछ ऐसी ही कैफ़ियत का हामिल था। जो रबड़ के जूते पहन कर चलने से पैदा होती हो। इसके बावजूद कि बाज़ार में लोगों की आमद-ओ-रफ़्त जारी थी और दुकानों में ज़िंदगी के आसार पैदा हो चुके थे आवाज़ें मद्धम थीं। जैसे सरगोशियां हो रही हैं, चुपके-चुपके, धीरे-धीरे बातें हो रही हैं, हौले-हौले लोग क़दम उठा रहे हैं कि ज़्यादा ऊंची आवाज़ पैदा न हो।

मसऊद बग़ल में बस्ता दबाये स्कूल जा रहा था। आज उसकी चाल भी सुस्त थी। जब उसने बे खाल के ताज़ा ज़बह किए हुए बकरों के गोश्त से सफ़ेद सफ़ेद धुआँ उठता देखा तो उसे राहत महसूस हुई। उस धुंए ने उसके ठंडे-ठंडे गालों पर गर्म-गर्म लकीरों का एक जाल सा बुन दिया। उस गर्मी ने उसे राहत पहुंचाई और वो सोचने लगा कि सर्दियों में ठंडे यख़ हाथों पर बेद खाने के बाद अगर ये धुआँ मिल जाया करे तो कितना अच्छा हो।

फ़िज़ा में उजलापन नहीं था। रोशनी थी मगर धुंधली। कुहर की एक पतली सी तह हर शय पर चढ़ी हुई थी जिससे फ़िज़ा में गदलापन पैदा हो गया था। ये गदलापन आँखों को अच्छा मालूम होता था इसलिए कि नज़र आने वाली चीज़ों की नोक-पलक कुछ मद्धम पड़ गई थी।

मसऊद जब स्कूल पहुंचा तो उसे अपने साथियों से ये मालूम करके क़तई तौर पर ख़ुशी न हुई कि स्कूल सिकंदर साहब की मौत के बाइस बंद कर दिया गया है। सब लड़के ख़ुश थे जिसका सबूत ये था कि वो अपने बस्ते एक जगह पर रख कर स्कूल के सहन में ऊटपटांग खेलों में मशग़ूल थे। कुछ छुट्टी का पता मालूम करते ही घर चले गए। कुछ आ रहे थे और कुछ नोटिस बोर्ड के पास जमा थे और बार बार एक ही इबारत पढ़ रहे थे।

मसऊद ने जब सुना कि सिकंदर साहब मर गए हैं तो उसे बिल्कुल अफ़सोस न हुआ। उसका दिल जज़्बात से बिल्कुल ख़ाली था। अलबत्ता उसने ये ज़रूर सोचा कि पिछले बरस जब उसके दादा जान का इंतिक़ाल इन ही दिनों में हुआ तो उनका जनाज़ा ले जाने में बड़ी दिक्कत हुई थी इसलिए कि बारिश शुरू हो गई थी। वो भी जनाज़े के साथ गया था और क़ब्रिस्तान में चिकनी कीचड़ के बाइस ऐसा फिसला था कि खुदी हुई क़ब्र में गिरते गिरते बचा था।

ये सब बातें उसको अच्छी तरह याद थीं। सर्दी की शिद्दत, उसके कीचड़ से लतपत कपड़े, सुर्ख़ी माइल नीले हाथ जिनको दबाने से सफ़ेद सफ़ेद धब्बे पड़ जाते थे। नाक जो कि बर्फ़ की डली मालूम होती थी और फिर आकर हाथ पांव धोने और कपड़े बदलने का मरहला... ये सब कुछ उसको अच्छी तरह याद था, चुनांचे जब उसने सिकंदर साहब की मौत की ख़बर सुनी तो उसे ये बीती हुई बातें याद आ गईं और उसने सोचा, जब सिकंदर साहब का जनाज़ा उठेगा तो बारिश शुरू हो जाएगी और क़ब्रिस्तान में इतनी कीचड़ हो जाएगी कि कई लोग फिसलेंगे और उनको ऐसी चोटें आयेंगी कि बिलबिला उठेंगे।

मसऊद ने ये ख़बर सुन कर सीधा अपने कमरे का रुख़ किया। कमरे में पहुंच कर उसने अपने डेस्क का ताला खोला। दो तीन किताबें जो कि उसे दूसरे रोज़ फिर लाना थीं उसमें रखीं और बाक़ी बस्ता उठा कर घर की जानिब चल पड़ा।

रास्ते में उसने फिर वही दो ताज़ा ज़बह किए हुए बकरे देखे। उनमें से एक को अब कसाई ने लटका दिया था, दूसरा तख़्ते पर पड़ा था। जब मसऊद दुकान पर से गुज़रा तो उसके दिल में ख़्वाहिश पैदा हुई कि वो गोश्त को जिसमें से धुआँ उठ रहा था छू कर देखे, चुनांचे आगे बढ़ कर उसने उंगली से बकरे के उस हिस्से को छूकर देखा जो अभी तक फड़क रहा था, गोश्त गर्म था। मसऊद की ठंडी उंगली को ये हरारत बहुत भली मालूम हुई। कसाई दुकान के अंदर छुरियां तेज़ करने में मसरूफ़ था। चुनांचे मसऊद ने एक बार फिर गोश्त को छू कर देखा और वहां से चल पड़ा।

घर पहुंच कर उसने जब अपनी माँ को सिकंदर साहब की मौत की ख़बर सुनाई तो उसे मालूम हुआ कि उसके अब्बा जी उन्ही के जनाज़े के साथ गए हैं। अब घर में सिर्फ़ दो आदमी थे, माँ और बड़ी बहन। माँ बावर्चीख़ाना में बैठी सालन पका रही थी और बड़ी बहन कुलसूम पास ही एक कांगड़ी लिए दरबारी की सरगम याद कर रही थी।

चूँकि गली के दूसरे लड़के गर्वनमेंट स्कूल में पढ़ते थे, जिस पर इस्लामिया स्कूल के सिकंदर की मौत का कुछ असर नहीं पड़ा था। इसलिए मसऊद ने ख़ुद को बिल्कुल बेकार महसूस किया। स्कूल का कोई काम भी नहीं था। छटी जमात में जो कुछ पढ़ाया जाता है वो घर में अपने अब्बा जी से पढ़ चुका था। खेलने के लिए भी उसके पास कोई चीज़ न थी।

एक मैला कुचैला ताश ताक़ में पड़ा था मगर उससे मसऊद को कोई दिलचस्पी नहीं थी। लूडो और इसी क़िस्म के दूसरे खेल जो उसकी बड़ी बहन अपनी सहेलियों के साथ हर रोज़ खेलती थी, उसकी समझ से बालातर थे। समझ से बालातर यूं थे कि मसऊद ने कभी उनको समझने की कोशिश ही नहीं की थी। उसको फ़ित्रतन ऐसे खेलों से कोई लगाव नहीं था।

बस्ता अपनी जगह पर रखने और कोट उतारने के बाद वो बावर्चीख़ाने में अपनी माँ के पास बैठ गया और दरबारी की सरगम सुनता रहा जिसमें कई दफ़ा सारे गामा आता था। उसकी माँ पालक काट रही थी। पालक काटने के बाद उसने सब्ज़-सब्ज़ पत्तों का गीला-गीला ढेर उठा कर हंडिया में डाल दिया। थोड़ी देर के बाद जब पालक को आंच लगी तो उसमें से सफ़ेद-सफ़ेद धुआँ उठने लगा। उस धुएँ को देख कर मसऊद को बकरे का गोश्त याद आगया।

चुनांचे उसने अपनी माँ से कहा, “अम्मी जान, आज मैंने क़साई की दुकान पर दो बकरे देखे। खाल उतरी हुई थी और उनमें से धुआँ निकल रहा था बिल्कुल ऐसे ही जैसा कि सुबह सवेरे मेरे मुँह से निकला करता है।”

“अच्छा...!” ये कह कर उसकी माँ चूल्हे में लकड़ियों के कोयले झाड़ने लगी।
“हाँ और मैंने गोश्त को अपनी उंगली से छू कर देखा तो वो गर्म था।”

“अच्छा...!” ये कह कर उसकी माँ ने वो बर्तन उठाया जिसमें उसने पालक का साग धोया था और बावर्चीख़ाना से बाहर चली गई।
“और ये गोश्त कई जगह पर फड़कता भी था।”

“अच्छा...” मसऊद की बड़ी बहन ने दरबारी सरगम याद करना छोड़ दी और उसकी तरफ़ मुतवज्जा हुई, “कैसे फड़कता था?”
“यूं... यूं।” मसऊद ने उंगलियों से फड़कन पैदा करके अपनी बहन को दिखाई।

“तो फिर क्या हुआ?”
ये सवाल कुलसूम ने अपने सरगम भरे दिमाग़ से कुछ इस तौर पर निकाला कि मसऊद एक लहज़े के लिए बिल्कुल ख़ालीउज़्ज़हन हो गया, “फिर क्या होना था, मैंने तो ऐसे ही आप से बात की थी कि क़साई की दुकान पर गोश्त फड़क रहा था। मैंने उंगली से छू कर भी देखा था, गर्म था।”

“गर्म था... अच्छा मसऊद ये बताओ तुम मेरा एक काम करोगे।”
“बताईए।”

“आओ, मेरे साथ आओ।”
“नहीं आप पहले बताईए, काम क्या है।”

“तुम आओ तो सही, मेरे साथ।”
“जी नहीं... आप पहले काम बताईए।”

देखो मेरी कमर में बड़ा दर्द हो रहा है... मैं पलंग पर लेटती हूँ, तुम ज़रा पांव से दबा देना... अच्छे भाई जो हुए। अल्लाह की क़सम बड़ा दर्द हो रहा है।” ये कह कर मसऊद की बहन ने अपनी कमर पर मुक्कियां मारना शुरू कर दीं।
“ये आप की कमर को क्या हो जाता है। जब देखो दर्द हो रहा है, और फिर आप दबवाती भी मुझी से हैं, क्यों नहीं अपनी सहेलियों से कहतीं।” मसऊद उठ खड़ा हुआ।

“चलिए, लेकिन ये आप से कहे देता हूँ कि दस मिनट से ज़्यादा में बिल्कुल नहीं दबाऊंगा।”
“शाबाश... शाबाश।” उसकी बहन उठ खड़ी हुई और सरगमों की कापी सामने ताक़ में रख कर उस कमरे की तरफ़ रवाना हुई जहां वो और मसऊद दोनों सोते थे।

सहन में पहुंच कर उसने अपनी दुखती हुई कमर सीधी की और ऊपर आसमान की तरफ़ देखा। मटियाले बादल झुके हुए थे, “मसऊद, आज ज़रूर बारिश होगी।”
ये कह कर उसने मसऊद की तरफ़ देखा मगर वो अंदर अपनी चारपाई पर लेटा था।

जब कुलसूम अपने पलंग पर औंधे मुँह लेट गई तो मसऊद ने उठ कर घड़ी में वक़्त देखा, “देखिए बाजी ग्यारह बजने में दस मिनट बाक़ी हैं। मैं पूरे ग्यारह बजे आपकी कमर दाबना छोड़ दूंगा।”

“बहुत अच्छा, लेकिन तुम अब ख़ुदा के लिए ज़्यादा नख़रे न बघारो। इधर मेरे पलंग पर आकर जल्दी कमर दबाओ वर्ना याद रखो बड़े ज़ोर से कान ऐंठूंगी।” कुलसूम ने मसऊद को डांट पिलाई।

मसऊद ने अपनी बड़ी बहन के हुक्म की तामील की और दीवार का सहारा लेकर पांव से उसकी कमर दबाना शुरू कर दी। मसऊद के वज़न के नीचे कुलसूम की चौड़ी चकली कमर में ख़फ़ीफ़ सा झुकाव पैदा हो गया। जब उसने पैरों से दबाना शुरू किया, ठीक उसी तरह जिस तरह मज़दूर मिट्टी गूँधते हैं तो कुलसूम ने मज़ा लेने की ख़ातिर हौले-हौले हाय-हाय करना शुरू किया।

कुलसूम के कूल्हों पर गोश्त ज़्यादा था, जब मसऊद का पांव उस हिस्से पर पड़ा तो उसे ऐसा महसूस हुआ कि वो उस बकरे के गोश्त को दबा रहा है जो उसने क़साई की दुकान में अपनी उंगली से छू कर देखा था। इस एहसास ने चंद लमहात के लिए उसके दिल-ओ-दिमाग़ में ऐसे ख़यालात पैदा किए जिनका कोई सर था न पैर, वो उनका मतलब न समझ सका और समझता भी कैसे जबकि कोई ख़याल मुकम्मल नहीं था।

एक-दो बार मसऊद ने ये भी महसूस किया कि उसके पैरों के नीचे गोश्त के लोथड़ों में हरकत पैदा हुई है, उसी क़िस्म की हरकत जो उसने बकरे के गर्म-गर्म गोश्त में देखी थी। उसने बड़ी बददिली से कमर दबाना शुरू की थी मगर अब उसे इस काम में लज़्ज़त महसूस होने लगी। उसके वज़न के नीचे कुलसूम हौले-हौले कराह रही थी। ये भींची-भींची आवाज़ जो कि मसऊद के पैरों की हरकत का साथ दे रही थी इस गुमनाम सी लज़्ज़त में इज़ाफ़ा कर रही थी।

टाइम पीस में ग्यारह बज गए मगर मसऊद अपनी बहन कुलसूम की कमर दबाता रहा जब कमर अच्छी तरह दबाई जा चुकी तो कुलसूम सीधी लेट गई और कहने लगी, “शाबाश मसऊद, शाबाश। लो अब लगे हाथों टांगें भी दबा दो, बिल्कुल उसी तरह... शाबाश मेरे भाई।”

मसऊद ने दीवार का सहारा लेकर कुलसूम की रानों पर जब अपना पूरा वज़न डाला तो उसके पांव के नीचे मछलियां सी तड़प गईं। बेइख़्तयार वो हंस पड़ी और दुहरी हो गई। मसऊद गिरते गिरते बचा, लेकिन उसके तलवों में मछलियों की वो तड़प मुंजमिद सी हो गई। उसके दिल में ख़्वाहिश पैदा हुई कि वो फिर इसी तरह दीवार का सहारा लेकर अपनी बहन की रानें दबाये, चुनांचे उसने कहा, “ये आपने हंसना क्यों शुरू कर दिया। सीधी लेट जाईए, मैं आपकी टांगें दबा दूं।”

कुलसूम सीधी लेट गई। रानों की मछलियां इधर-उधर होने के बाइस जो गुदगुदी पैदा हुई थी उसका असर अभी तक उसके जिस्म में बाक़ी था, “ना भाई मेरे गुदगुदी होती है। तुम ऊटपटांग तरीक़े से दबाते हो।”

मसऊद ने ख़याल किया कि शायद उसने ग़लत तरीक़ा इस्तेमाल किया है। “नहीं, अब की दफ़ा मैं पूरा बोझ आप पर नहीं डालूंगा... आप इत्मिनान रखिए। अब ऐसी अच्छी तरह दबाऊंगा कि आपको कोई तकलीफ़ न होगी।”
दीवार का सहारा लेकर मसऊद ने अपने जिस्म को तोला और इस अंदाज़ से आहिस्ता- आहिस्ता कुलसूम की रानों पर अपने पैर जमाए कि उसका आधा बोझ कहीं ग़ायब हो गया।

हौले-हौले बड़ी होशयारी से उसने अपने पैर चलाने शुरू किए। कुलसूम की रानों में अकड़ी हुई मछलियां उसके पैरों के नीचे दब-दब कर इधर-उधर फिसलने लगीं। मसऊद ने एक बार स्कूल में तने हुए रस्से पर एक बाज़ीगर को चलते देखा था। उसने सोचा कि बाज़ीगर के पैरों के नीचे तना हुआ रस्सा इसी तरह फिसलता होगा।

इससे पहले कई बार उसने अपनी बहन कुलसूम की टांगें दबाई थीं मगर वो लज़्ज़त जो कि उसे अब महसूस हो रही थी पहले कभी महसूस नहीं हुई थी। बकरे के गर्म-गर्म गोश्त का उसे बार-बार ख़याल आता था। एक दो मर्तबा उसने सोचा कुलसूम को अगर ज़बह कर दिया जाये तो खाल उतर जाने पर क्या इसके गोश्त में से भी धुआँ निकलेगा? लेकिन ऐसी बेहूदा बातें सोचने पर उसने अपने आपको मुजरिम महसूस किया और दिमाग़ को इस तरह साफ़ कर दिया जैसे वो स्लेट को स्फ़ंज से साफ़ किया करता था।

“बस बस।” कुलसूम थक गई, “बस बस।”
मसऊद को एक दम शरारत सूझी। वो पलंग पर से नीचे उतरने लगा तो उसने कुलसूम की दोनों बग़लों में गुदगुदी करना शुरू कर दी। हंसी के मारे वो लोटपोट हो गई। उसमें इतनी सकत नहीं थी कि वो मसऊद के हाथों को परे झटक दे। लेकिन जब उसने इरादा करके उसके लात जमानी चाही तो मसऊद उछल कर ज़द से बाहर हो गया और स्लीपर पहन कर कमरे से निकल गया।

जब वो सहन में दाख़िल हुआ तो उसने देखा कि हल्की हल्की बूंदा बांदी हो रही है। बादल और भी झुक आए थे। पानी के नन्हे नन्हे क़तरे आवाज़ पैदा किए बग़ैर सहन की ईंटों में आहिस्ता-आहिस्ता जज़्ब हो रहे थे। मसऊद का जिस्म एक दिल-नवाज़ हरारत महसूस कर रहा था। जब हवा का ठंडा ठंडा झोंका उसके गालों के साथ मस हुआ और दो-तीन नन्ही- नन्ही बूंदें उसकी नाक पर पड़ीं तो एक झुरझुरी सी उसके बदन में लहरा उठी।

सामने कोठे की दीवार पर एक कबूतर और कबूतरी पास पास पर फुलाए बैठे थे, ऐसा मालूम होता था कि दोनों दम-पुख़्त की हुई हंडिया की तरह गर्म हैं। गुल दाऊदी और नाज़बू के हरे- हरे पत्ते ऊपर लाल-लाल गमलों में नहा रहे थे। फ़िज़ा में नींदें घुली हुई थीं। ऐसी नींदें जिनमें बेदारी ज़्यादा होती है और इंसान के इर्द-गिर्द नर्म-नर्म ख़्वाब यूं लिपट जाते हैं जैसे ऊनी कपड़े।

मसऊद ऐसी बातें सोचने लगा जिनका मतलब उसकी समझ में नहीं आता था। वो उन बातों को छू कर देख सकता था मगर उनका मतलब उसकी गिरफ्त से बाहर था, फिर भी एक गुमनाम सा मज़ा इस सोच-बिचार में उसे आ रहा था।

बारिश में कुछ देर खड़े रहने के बाइस जब मसऊद के हाथ बिल्कुल यख़ हो गए और दबाने से उन पर सफ़ेद धब्बे पड़ने लगे तो उसने मुट्ठीयाँ कस लीं और उनको मुँह की भाप से गर्म करना शुरू किया। हाथों को इस अमल से कुछ गर्मी तो पहुंची मगर वो नमआलूद होगए। चुनांचे आग तापने के लिए वो बावर्चीख़ाना में चला गया। खाना तैयार था, अभी उसने पहला लुक़मा ही उठाया था कि उसका बाप क़ब्रिस्तान से वापस आगया।

बाप-बेटे में कोई बात न हुई। मसऊद की माँ उठ कर फ़ौरन दूसरे कमरे में चली गई और वहां देर तक अपने ख़ाविंद के साथ बातें करती रही।
खाने से फ़ारिग़ हो कर मसऊद बैठक में चला गया और खिड़की खोल कर फ़र्श पर लेट गया। बारिश की वजह से सर्दी की शिद्दत बढ़ गई थी क्योंकि अब हवा भी चल रही थी, मगर ये सर्दी नाख़ुशगवार मालूम नहीं होती थी। तालाब के पानी की तरह ये ऊपर ठंडी और अंदर गर्म थी।

मसऊद जब फ़र्श पर लेटा तो उसके दिल में ख़्वाहिश पैदा हुई कि वो इस सर्दी के अंदर धँस जाये जहां उसके जिस्म को राहत अंगेज़ गर्मी पहुंचे। देर तक वो ऐसी शीर-गर्म बातों के मुतअल्लिक़ सोचता रहा जिसके बाइस उसके पुट्ठों में हल्की-हल्की सी दुखन पैदा हो गई। 

एक दो बार उसने अंगड़ाई ली तो उसे मज़ा आया। उसके जिस्म के किसी हिस्से में, ये उसको मालूम नहीं था कि कहाँ, कोई चीज़ अटक सी गई थी, ये चीज़ क्या थी। इसके मुतअल्लिक़ भी मसऊद को इल्म नहीं था। अलबत्ता इस अटकाव ने उसके सारे जिस्म में इज़तिराब, एक दबे हुए इज़तिराब की कैफ़ियत पैदा कर दी थी। उसका सारा जिस्म खिंच कर लंबा हो जाने का इरादा बन गया था।

देर तक गुदगुदे क़ालीन पर करवटें बदलने के बाद वो उठा और बावर्चीख़ाना से होता हुआ सहन में आ निकला। न कोई बावर्चीख़ाना में था और न सहन में। इधर-उधर जितने कमरे थे सबके सब बंद थे। बारिश अब रुक गई थी। मसऊद ने हाकी और गेंद निकाली और सहन में खेलना शुरू कर दिया। एक बार जब उसने ज़ोर से हिट लगाई तो गेंद सहन के दाएं हाथ वाले कमरे के दरवाज़े पर लगी। अंदर से मसऊद के बाप की आवाज़ आई, “कौन?”
“जी, मैं हूँ मसऊद!”

अंदर से आवाज़ आई, “क्या कर रहे हो?”
“जी, खेल रहा हूँ।”

“खेलो...” फिर थोड़े से तवक्कुफ़ के बाद उसके बाप ने कहा, “तुम्हारी माँ मेरा सरदबा रही है... ज़्यादा शोर न मचाना।”

ये सुन कर मसऊद ने गेंद वहीं पड़ी रहने दी और हाकी हाथ में लिए सामने वाले कमरे का रुख़ किया। उसका एक दरवाज़ा बंद था और दूसरा नीम वा... मसऊद को एक शरारत सूझी। दबे पांव वो नीम वा दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा और धमाके के साथ दोनों पट खोल दिए। दो चीख़ें बुलंद हुईं और कुलसूम और उसकी सहेली बिमला ने जो कि पास पास लेटी थी, ख़ौफ़ज़दा हो कर झट से लिहाफ़ ओढ़ लिया।

बिमला के ब्लाउज़ के बटन खुले हुए थे और कुलसूम उसके उर्यां सीने को घूर रही थी।

मसऊद कुछ समझ न सका, उसके दिमाग़ में धुआँ सा छा गया। वहां से उल्टे क़दम लौट कर वो जब बैठक की तरफ़ रवाना हुआ तो उसे मअन अपने अंदर एक अथाह ताक़त का एहसास हुआ, जिसने कुछ देर के लिए उसकी सोचने-समझने की क़ुव्वत बिल्कुल कमज़ोर कर दी।

बैठक में खिड़की के पास बैठ कर जब मसऊद ने हाकी को दोनों हाथों से पकड़ कर घुटने पर रखा तो ये सोचा कि हल्का सा दबाव डालने पर हाकी में ख़म पैदा हो जाएगा, और ज़्यादा ज़ोर लगाने पर हैंडल चटाख़ से टूट जाएगा। उसने घुटने पर हाकी के हैंडल में ख़म तो पैदा कर लिया मगर ज़्यादा से ज़्यादा ज़ोर लगाने पर भी वो टूट न सका। देर तक वो हाकी के साथ कुश्ती लड़ता रहा। जब वो थक कर हार गया तो झुँझला कर उसने हाकी परे फेंक दी।

बू

Short Story

सआदत हसन मंटो ✍️ 


स्टोरीलाइन-

यह एक घाटन लड़की के जिस्म से पैदा होने वाली बू की कहानी है। रणधीर सिंह एक खू़बसूरत नौजवान और औरतों के मामले में मंझा हुआ खिलाड़ी है। लेकिन उसे जो लज्ज़त घाटन लड़की के जिस्म से महसूस होती है वह उसने आज तक किसी और औरत में महसूस नहीं की थी। रणधीर को पसीने की बू से सख़्त नफ़रत है। फिर वह उस घाटन लड़की के जिस्म की बू को अपनी रग-रग में बसा लेने के लिए तड़पता रहता है ।


बू

बरसात के यही दिन थे। खिड़की के बाहर पीपल के पत्ते इसी तरह नहा रहे थे। सागवान के इस स्प्रिंगदार पलंग पर जो अब खिड़की के पास से थोड़ा इधर सरका दिया गया था एक घाटन लौंडिया रणधीर के साथ चिपटी हुई थी।

खिड़की के पास बाहर पीपल के नहाए हुए पत्ते रात के दूधिया अंधेरे में झूमरों की तरह थरथरा रहे थे और शाम के वक़्त जब दिन भर एक अंग्रेज़ी अख़बार की सारी ख़बरें और इश्तिहार पढ़ने के बाद कुछ सुनाने के लिए वो बालकनी में आ खड़ा हुआ था तो उसने उस घाटन लड़की को जो साथ वाले रस्सियों के कारख़ाने में काम करती थी और बारिश से बचने के लिए इमली के पेड़ के नीचे खड़ी थी, खांस खांस कर अपनी तरफ़ मुतवज्जा कर लिया था और उसके बाद हाथ के इशारे से ऊपर बुला लिया था।

वो कई दिन से शदीद क़िस्म की तन्हाई से उकता गया था। जंग के बाइस बंबई की तक़रीबन तमाम क्रिस्चियन छोकरियाँ जो सस्ते दामों मिल जाया करती थीं औरतों की अंग्रेज़ी फ़ौज में भर्ती हो गई थीं, उनमें से कई एक ने फोर्ट के इलाक़े में डांस स्कूल खोल लिए थे जहां सिर्फ़ फ़ौजी गोरों को जाने की इजाज़त थी... रणधीर बहुत उदास हो गया था।

उसकी अना का सबब तो ये था कि क्रिस्चियन छोकरियां नायाब हो गई थीं और दूसरा ये कि फ़ौजी गोरों के मुक़ाबले में कहीं ज़्यादा मुहज़्ज़ब, तालीमयाफ़्ता और ख़ूबसूरत नौजवान उस पर फोर्ट के लगभग तमाम क्लबों के दरवाज़े बंद कर दिए थे। उसकी चमड़ी सफ़ेद नहीं थी।

जंग से पहले रणधीर नागपाड़ा और ताजमहल होटल की कई मशहूर-ओ-मारूफ़ क्रिस्चियन लड़कियों से जिस्मानी तअल्लुक़ात क़ायम कर चुका था। उसे बख़ूबी इल्म था कि इस क़िस्म के तअल्लुक़ात की क्रिस्चियन लड़कों के मुक़ाबले में कहीं ज़्यादा मालूमात रखता था जिनसे ये छोकरियां आम तौर पर रोमांस लड़ाती हैं और बाद में किसी बेवक़ूफ़ से शादी कर लेती हैं।

रणधीर ने बस यूं ही हैजल से बदला लेने की ख़ातिर उस घाटन लड़की को इशारे पर बुलाया था। हैजल उसके फ़्लैट के नीचे रहती थी और हर रोज़ सुबह वर्दी पहन कर कटे हुए बालों पर ख़ाकी रंग की टोपी तिर्छे ज़ाविए से जमा कर बाहर निकलती थी और लड़कपन से चलती थी जैसे फुटपाथ पर चलने वाले सभी लोग टाट की तरह उसके रास्ते में बिछे चले जाऐंगे।

रणधीर सोचता था कि आख़िर क्यों वो इन क्रिस्चियन छोकरियों की तरफ़ इतना ज़्यादा माइल है। इसमें कोई शक नहीं कि वो अपने जिस्म की तमाम दिखाई जा सकने वाली अश्या की नुमाइश करती हैं। किसी क़िस्म की झिजक महसूस किए बग़ैर अपने कारनामों का ज़िक्र कर देती हैं। अपने बीते पुराने रोमांसों का हाल सुना देती हैं... ये सब ठीक है लेकिन किसी दूसरी लड़की में भी तो ये खासियतें हो सकती हैं।

रणधीर ने जब घाटन लड़की को इशारे से ऊपर बुलाया तो उसे किसी तरह भी इस बात का यक़ीन नहीं था कि वो उसे अपने साथ सुला लेगा लेकिन थोड़ी ही देर के बाद उसने उसके भीगे हुए कपड़े देख कर ये सोचा था कि कहीं ऐसा न हो कि बेचारी को निमोनिया हो जाये तो रणधीर ने उससे कहा था, “ये कपड़े उतार दो। सर्दी लग जाएगी।”

वो रणधीर की इस बात का मतलब समझ गई थी क्योंकि उसकी आँखों में शर्म के लाल डोरे तैर गए थे लेकिन बाद में जब रणधीर ने उसे अपनी धोती निकाल कर दी तो उसने कुछ देर सोच कर अपना लहंगा उतार दिया। जिस पर मैल भीगने की वजह से और भी नुमायां हो गया था। लहंगा उतार कर उसने एक तरफ़ रख दिया और जल्दी से धोती अपनी रानों पर डाल ली। फिर उसने अपनी तंग भिंची भिंची चोली उतारने की कोशिश की जिसके दोनों किनारों को मिला कर उसने एक गांठ दे रखी थी। वो गांठ उसके तंदुरुस्त सीने के नन्हे लेकिन समटीले गढ़े में छिप गई थी।

देर तक वो अपने घिसे हुए नाख़ुनों की मदद से चोली की गांठ खोलने की कोशिश करती रही जो भीगने की वजह से बहुत ज़्यादा मज़बूत हो गई थी। जब थक हार कर बैठ गई तो उसने मराठी ज़बान में रणधीर से कुछ कहा जिसका मतलब ये था, “मैं क्या करूं... नहीं निकलती।”

रणधीर उसके पास बैठ गया और गांठ खोलने लगा। जब नहीं खुली तो उसने चोली के दोनों सिरों को दोनों हाथों में पकड़ कर इस ज़ोर से झटका दिया कि गांठ सरासर फैल गई और इसके साथ ही दो धड़कती हुई छातियां एक दम से नुमायां हो गईं।

लम्हा भर के लिए रणधीर ने सोचा कि उसके अपने हाथों ने इस घाटन लड़की के सीने पर, नर्म नर्म गुँधी हुई मिट्टी को माहिर कुम्हार की तरह दो प्यालों की शक्ल बना दी है।

उसकी सेहत मंद छातियों में वही गुदगुदाहट, वही धड़कन, वही गोलाई, वही गर्मगर्म ठंडक थी जो कुम्हार के हाथों से निकले हुए ताज़ा बर्तनों में होती है।

मटमैले रंग की जवान छातियों में जो बिल्कुल कुंवारी थीं। एक अजीब-ओ-ग़रीब क़िस्म की चमक पैदा कर दी थी जो चमक होते हुए भी चमक नहीं थी। उसके सीने पर ये ऐसे दीये मालूम होते थे जो तालाब के गदले पानी पर जल रहे थे।

बरसात के यही दिन थे। खिड़की के बाहर पीपल के पत्ते इसी तरह कपकपा रहे थे। लड़की के दोनों कपड़े जो पानी में शराबोर हो चुके थे एक गदले ढेर की सूरत में पड़े थे और वो रणधीर के साथ चिपटी हुई थी। उसके नंगे बदन की गर्मी उसके जिस्म में ऐसी हलचल सी पैदा कर रही थी जो सख़्त जाड़े के दिनों में नाइयों के गर्म हमामों में नहाते वक़्त महसूस हुआ करती है।

दिन भर वो रणधीर के साथ चिपटी रही... दोनों जैसे एक दूसरे के गड मड हो गए थे। उन्होंने बमुशकिल एक दो बातें की होंगी। क्योंकि जो कुछ भी हो रहा था सांसों, होंटों और हाथों से तय हो रहा था। रणधीर के हाथ सारी की छातियों पर हवा के झोंकों की तरह फिरते रहे। छोटी छोटी चूचियां और मोटे-मोटे गोल दाने जो चारों तरफ़ एक स्याह दायरे की शक्ल में फैले हुए थे हवाई झोंकों से जाग उठते और उस घाटन लड़की के पूरे बदन में एक सरसराहट पैदा हो जाती कि ख़ुद रणधीर भी कपकपा उठता।

ऐसी कपकपाहटों से रणधीर का सैकड़ों बार वास्ता पड़ चुका था। वो उनको बख़ूबी जानता था। कई लड़कियों के नर्म-ओ-नाज़ुक और सख़्त सीनों से अपना सीना मिला कर कई कई रातें गुज़ार चुका था। वो ऐसी लड़कियों के साथ भी रह चुका था जो बिल्कुल उसके साथ लिपट कर घर की वो सारी बातें सुना दिया करती थीं जो किसी ग़ैर के लिए नहीं होतीं। वो ऐसी लड़कियों से भी जिस्मानी तअल्लुक़ क़ायम कर चुका था जो सारी मेहनत करती थीं और उसे कोई तकलीफ़ नहीं देती थीं... लेकिन ये घाटन लड़की जो पेड़ के नीचे भीगी हुई खड़ी थी और जिसे उसने इशारे से ऊपर बुला लिया था, मुख़्तलिफ़ क़िस्म की लड़की थी।

सारी रात रणधीर को उसके जिस्म से एक अजीब क़िस्म की बू आती रही थी। उस बू को जो ब-यक-वक़्त ख़ुशबू भी थी और बदबू भी... वो सारी रात पीता रहा। उसकी बग़लों से, उसकी छातियों से, उसके बालों से, उसके पेट से, जिस्म के हर हिस्से से ये जो बदबू भी थी और ख़ुश्बू भी, रणधीर के पूरे सरापा में बस गई थी। सारी रात वो सोचता रहा था कि ये घाटन लड़की बिल्कुल क़रीब होने पर भी हर्गिज़ इतनी क़रीब न होती अगर उसके जिस्म से ये बू न उड़ती... ये बू उसके दिल-ओ-दिमाग़ की हर सलवट में रेंग रही थी। उसके तमाम नए- पुराने महसूसात में रच गई थी।

उस बू ने उस लड़की और रणधीर को जैसे एक दूसरे से हम-आहंग कर दिया था। दोनों एक दूसरे में मुदग़म हो गए थे। उन बेकरां गहराईयों में उतर गए थे जहां पहुंच कर इंसान एक ख़ालिस इंसानी तस्कीन से महज़ूज़ होता है। ऐसी तस्कीन जो लम्हाती होने पर भी जाविदां थी। मुसलसल तग़य्युर पज़ीर होने पर भी मज़बूत और मुस्तहकम थी। दोनों एक ऐसा जवाब बन गए थे जो आसमान के नीले ख़ला में माइल-ए-परवाज़ रहने पर भी दिखाई देता रहे।

उस बू को जो उस घाटन लड़की के अंग अंग से फूट रही थी रणधीर बख़ूबी समझता था लेकिन समझते हुए भी वो उसका तजज़िया नहीं कर सकता था। जिस तरह कभी मिट्टी पर पानी छिड़कने से सोंधी-सोंधी बू निकलती है... लेकिन नहीं, वो बू कुछ और तरह की थी। उसमें लैवेंडर और इत्र की आमेज़िश नहीं थी, वो बिल्कुल असली थी... औरत और मर्द के जिस्मानी तअल्लुक़ात की तरह असली और मुक़द्दस।

रणधीर को पसीने की बू से सख़्त नफ़रत थी। नहाने के बाद वो हमेशा बग़लों वग़ैरा में पाउडर छिड़कता था या कोई ऐसी दवा इस्तेमाल करता था जिससे वो बदबू जाती रहे लेकिन तअज्जुब है कि उसने कई बार... हाँ कई बार उस घाटन लड़की की बालों भरी बग़लों को चूमा और उसे बिल्कुल घिन नहीं आई बल्कि अजीब क़िस्म की तस्कीन का एहसास हुआ। रणधीर को ऐसा लगता था कि वो उसे पहचानता है। उसके मानी भी समझता है लेकिन किसी और को नहीं समझा सकता।

बरसात के यही दिन थे... यूं ही खिड़की के बाहर जब उसने देखा तो पीपल इसी तरह नहा रहे थे। हवा में सरसराहटें और फड़फड़ाहटें घुली हुई थीं।

उसमें दबी-दबी धुंदली सी रौशनी समाई हुई थी। जैसे बारिश की बूंदों का हल्का फुलका गुबार नीचे उतर आया हो... बरसात के यही दिन थे जब मेरे कमरे में सागवान का सिर्फ़ एक ही पलंग था। लेकिन अब इसके साथ एक और पलंग भी था और कोने में एक नई ड्रेसिंग टेबल भी मौजूद थी। दिन लंबे थे, मौसम भी बिल्कुल वैसा ही था। बारिश की बूंदों के हमराह सितारों की तरह उसका गुबार सा इसी तरह उतर रहा था लेकिन फ़िज़ा में हिना के इत्र की तेज़ ख़ुश्बू बसी हुई थी।

दूसरा पलंग ख़ाली था। उस पलंग पर रणधीर औंधे मुँह लेटा खिड़की के बाहर पीपल के पत्तों पर बारिश की बूंदों का रक़्स देख रहा था। एक गोरी चिट्टी लड़की जिस्म को चादर में छिपाने की नाकाम कोशिश करते करते क़रीब-क़रीब सो गई। उसकी सुर्ख़ रेशमी शलवार दूसरे पलंग पर पड़ी थी जिसके गहरे सुर्ख़ रंग का एक फुंदना नीचे लटक रहा था। पलंग पर उसके दूसरे उतारे कपड़े भी पड़े थे। सुनहरी फूलदार जंपर, अंगिया, जंगिया और दुपट्टा सुर्ख़ था। गहरा सुर्ख़ और इन सब में हिना के इत्र की तेज़ ख़ुश्बू बसी हुई थी। लड़की के स्याह बालों में मुक्क़ेश के ज़र्रे धूल के ज़र्रों की तरह जमे हुए थे। चेहरे पर पाउडर, सुर्ख़ी और मुक्क़ेश के इन ज़र्रों ने मिल जुल कर एक अजीब रंग बिखेर दिया था... बेनाम सा उड़ा उड़ा रंग और उसके गोरे सीने पर कच्चे रंग के जगह जगह सुर्ख़ धब्बे बना दिए थे।

छातियां दूध की तरह सफ़ेद थीं... उनमें हल्का-हल्का नीलापन भी था। बग़लों के बाल मुंडे हुए थे जिसकी वजह से वहां सुरमई गुबार सा पैदा हो गया था।

रणधीर उस लड़की की तरफ़ देख देख कर कई बार सोच चुका था... क्या ऐसा नहीं लगता जैसे मैंने अभी अभी कीलें उखेड़ कर उसको लकड़ी के बंद बक्स में से निकाला हो।

किताबों और चीनी के बर्तनों पर हल्की हल्की ख़राशें पड़ जाती हैं, ठीक उसी तरह उस लड़की के जिस्म पर भी कई निशान थे।

जब रणधीर ने उसकी तंग और चुस्त अंगिया की डोरियां खोली थीं तो उसकी पीठ पर और सामने सीने पर नर्म नर्म गोश्त पर झुर्रियां सी बनी हुई थीं और कमर के चारों तरफ़ कस कर बांधे हुए इज़ारबंद का निशान... वज़नी और नुकीले जड़ाऊ नेकलस से उसके सीने पर कई जगह ख़राशें पड़ गई थीं। जैसे नाखुनों से बड़े ज़ोर से खुजाया गया हो।

बरसात के वही दिन थे। पीपल के नर्म नर्म पत्तों पर बारिश की बूंदें गिरने से वैसी ही आवाज़ पैदा हो रही थी जैसी रणधीर उस दिन सारी रात सुनता रहा था। मौसम बेहद सुहाना था। ठंडी ठंडी हवा चल रही थी लेकिन उसमें हिना के इत्र की तेज़ ख़ुश्बू घुली हुई थी।

रणधीर के हाथ बहुत देर तक उस गोरी चिट्टी लड़की के कच्चे दूध की तरह सफ़ेद सीने पर हवा के झोंकों की तरह फिरते रहे थे। उसकी उंगलियों ने उस गोरे गोरे बदन में कई चिनगारियां दौड़ती हुई महसूस की थीं। इस नाज़ुक बदन में कई जगहों पर सिमटी हुई कपकपाहटों का भी उसे पता चला था जब उसने अपना सीना उसके सीने के साथ मिलाया तो रणधीर के जिस्म के हर रोंगटे ने उस लड़की के बदन के छिड़े हुए तारों की भी आवाज़ सुनी थी... मगर वो आवाज़ कहाँ थी?

वो पुकार जो उसने घाटन लड़की के बदन में देखी थी... वो पुकार जो दूध के प्यासे बच्चे के रोने से ज़्यादा होती है, वो पुकार जो हल्का-ए-ख़्वाब से निकल कर बेआवाज़ हो गई थी।

रणधीर खिड़की से बाहर देख रहा था। उसके बिल्कुल क़रीब ही पीपल के नहाते हुए पत्ते थरथरा रहे थे। वो उनकी मस्ती भरी कपकपाहटों के उस पार कहीं बहुत दूर देखने की कोशिश कर रहा था जहां मठीले बादलों में अजीब-ओ-ग़रीब क़िस्म की रौशनी घुली हुई दिखाई दे रही थी... ठीक वैसे ही जैसी उस घाटन लड़की के सीने में उसे नज़र आती थी। ऐसी पुरअसरार गुफ़्तगु की तरह दबी लेकिन वाज़ेह थी।

रणधीर के पहलू में एक गोरी चिट्टी लड़की... जिसका जिस्म दूध और घी में गुँधे मैदे की तरह मुलाइम था, लेटी थी... उसके नींद से माते बदन से हिना के इत्र की ख़ुश्बू आरही थी... जो अब थकी थकी सी मालूम होती थी। रणधीर को ये दम तोड़ती और जनों की हुई ख़ुश्बू बहुत बुरी मालूम हुई। उसमें कुछ खटास थी... एक अजीब क़िस्म की जैसी बदहज़मी के डकारों में होती है। उदास... बेरंग... बेचैन।

रणधीर ने अपने पहलू में लेटी हुई लड़की की तरफ़ देखा। जिस तरह फटे हुए दूध के बेरंग पानी में सफ़ेद मुर्दा फुटकियां तैरने लगती हैं उसी तरह उस लड़की के जिस्म पर ख़राशें और धब्बे तैर रहे थे और वो हिना के इत्र की ऊटपटांग ख़ुश्बू... रणधीर के दिल-ओ-दिमाग़ में वो बू बसी हुई थी जो उस घाटन लड़की के जिस्म से बना किसी कोशिश के अज़ ख़ुद निकल रही थी। वो बू जो हिना के इत्र से कहीं ज़्यादा हल्की फुल्की और दबी हुई थी जिसमें सूंघे जाने की कोशिश शामिल नहीं थी। वो ख़ुदबख़ुद नाक के अंदर घुस कर अपनी सही मंज़िल पर पहुंच जाती थी।

रणधीर ने आख़िरी कोशिश के तौर पर उस लड़की के दूधिया जिस्म पर हाथ फेरा लेकिन कपकपी महसूस न हुई... उसकी नई नवेली बीवी जो एक फ़र्स्ट क्लास मजिस्ट्रेट की बीवी थी, जिसने बी.ए. तक तालीम हासिल की थी और जो अपने कॉलिज के सैकड़ों लड़कों के दिलों की धड़कन थी, रणधीर की किसी भी हिस्स को न छू सकी। वो हिना की ख़ुशबू में उस बू को तलाश कर रहा था जो उन्हीं दिनों में जबकि खिड़की के बाहर पीपल के पत्ते बारिश में नहा रहे थे। इस घाटन लड़की के मैले बदन से आई थी।