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Poetry, Nazm, Ghazal, Shayari, Short Stories Contents.
Friday, April 24, 2026
ये काफ़ी है कि हम दुश्मन नहीं हैं,वफ़ा-दारी का दावा क्यूँ करें हम
काली काली ज़ुल्फ़ों के फंदे न डालो
भूल हो जाती है यूँ तैश में आया न करो
फ़ासले ख़त्म करो बात बढ़ाया न करो
ये निगाहें ये इशारे ये अदाएँ तौबा
इन शराबों को सर-ए-'आम लुटाया न करो
शाम गहरी हो तो कुछ और हसीं होती है
साया-ए-ज़ुल्फ़ को चेहरे से हटाया न करो
काली काली ज़ुल्फ़ों के फंदे न डालो
हमें ज़िंदा रहने दो ऐ हुस्न वालो
न छेड़ो हमें हम सताए हुए हैं
बहुत ज़ख़्म सीने पे खाए हुए हैं
सितम-गर हो तुम ख़ूब पहचानते हैं
तुम्हारी अदाओं को हम जानते हैं
दग़ा-बाज़ हो तुम सितम ढाने वाले
फ़रेब-ए-मोहब्बत में उलझाने वाले
ये रंगीं कहानी तुम्ही को मुबारक
तुम्हारी जवानी तुम्ही को मुबारक
हमारी तरफ़ से निगाहें हटा लो
काली काली ज़ुल्फ़ों के फंदे न डालो
हमें ज़िंदा रहने दो ऐ हुस्न वालो
ज़ंजीर में ज़ुल्फ़ों की फँस जाने को क्या कहिए
दीवाना मेरा दिल है दीवाने को क्या कहिए
सँभालो ज़रा अपना आँचल गुलाबी
दिखाओ न हँस-हँस के आँखें शराबी
सुलूक उन का दुनिया में अच्छा नहीं है
हसीनों पे हम को भरोसा नहीं है
उठाते हैं नज़रें तो गिरती हैं बिजली
अदा जो भी निकली क़यामत ही निकली
जहाँ तुम ने चेहरे से आँचल हटाया
वहीं अहल-ए-दिल को तमाशा बनाया
काली काली ज़ुल्फ़ों के फंदे न डालो
हमें ज़िंदा रहने दो ऐ हुस्न वालो
ख़ुदा के लिए हम पे डोरे न डालो
हमें ज़िंदा रहने दो ऐ हुस्न वालो
आवारा हुई जाती है ज़ुल्फ़ों को सँभालो
दिल मेरा उलझ जाएगा ये जाल न डालो
काली काली ज़ुल्फ़ों के फंदे न डालो
हमें ज़िंदा रहने दो ऐ हुस्न वालो
अपनी इस ज़ुल्फ़-ए-परेशाँ को सँभालो वर्ना
ऐसे गुस्ताख़ को हम चूम लिया करते हैं
काली काली ज़ुल्फ़ों के फंदे न डालो
हमें ज़िंदा रहने दो ऐ हुस्न वालो
उलझा है पाँव यार का ज़ुल्फ़-ए-दराज़ में
लो आप अपने दाम में सय्याद आ गए
काली काली ज़ुल्फ़ों के फंदे न डालो
हमें ज़िंदा रहने दो ऐ हुस्न वालो
सदा वार करते हो तेग़-ए-वफ़ा का
बहाते हो तुम ख़ून अहल-ए-वफ़ा का
ये नागिन सी ज़ुल्फ़ें ये ज़हरीली नज़रें
वो पानी न माँगे ये जिस को डस ले
वो लुट जाए जो तुम से दिल को लगा ले
फिर हसरतों का जनाज़ा उठाए
है मा'लूम हम को तुम्हारी हक़ीक़त
मोहब्बत के पर्दे में करते हो नफ़रत
कहीं और जा के अदाएँ उछालो
काली काली ज़ुल्फ़ों के फंदे न डालो
हमें ज़िंदा रहने दो ऐ हुस्न वालो
ये झूटी नुमाइश ये झूटी बनावट
फ़रेब-ए-नज़र है नज़र की लगावट
ये सुम्बुल से गेसू ये 'आरिज़ गुलाबी
ज़माने मिलाएँगे इक दिन ख़राबी
'फ़ना' हम को कर दे न ये मुस्कुराना
अदा काफ़िराना चलन ज़ालिमाना
दिखाओ न ये इश्वा-ओ-नाज़ हम को
किसी और पर ज़ुल्फ़ का जाल डालो
सिखाओ न उल्फ़त के अंदाज़ हम को
काली काली ज़ुल्फ़ों के फंदे न डालो
हमें ज़िंदा रहने दो ऐ हुस्न वालो
अपनी ज़ुल्फ़ों का पर्दा बना लीजिए
हुस्न-ए-मा'सूम अब फ़ित्ना-गर हो गया
पलकें गिर जाएँगी डोर जल जाएगा
रुख़ तुम्हारी नज़र का जिधर हो गया
काली काली ज़ुल्फ़ों के फंदे न डालो
हमें ज़िंदा रहने दो ऐ हुस्न वालो ।
फ़ना बुलंदशहरी✍️
Wednesday, April 22, 2026
शर्मिंदगी है हम को बहुत हम मिले तुम्हें
शर्मिंदगी है हम को बहुत हम मिले तुम्हें
तुम सर-ब-सर खुशी थे मगर ग़म मिले तुम्हें ।
जौन एलिया ✍️
जौन एलिया की इस प्रसिद्ध पंक्ति का अर्थ है कि शायर को इस बात का बहुत अफ़सोस (शर्मिंदगी) है कि उनके प्रियतम (जो स्वयं में संपूर्ण खुशी थे) को वे (शायर) मिले, क्योंकि शायर ने उन्हें खुशी के बजाय केवल ग़म, दुःख और तन्हाई दी।
विस्तृत अर्थ:
शर्मिंदगी है हम को बहुत हम मिले तुम्हें: शायर अपनी मोहब्बत की नाकामी पर शर्मिंदा हैं कि वे अपने साथी को वो खुशियां नहीं दे पाए, जिसके वे हकदार थे।
तुम सर-ब-सर खुशी थे मगर ग़म मिले तुम्हें: इसका मतलब है कि तुम पूरी तरह से (सर-ब-सर) ख़ुशी और मासूमियत का रूप थे, लेकिन तुम्हें बदले में सिर्फ मेरे द्वारा दिए गए गम (दुःख) ही मिले।
भावार्थ: यह शेर निराशा और आत्म-बोध (Self-realization) का है, जिसमें शायर को महसूस होता है कि वह अपने साथी के जीवन में सकारात्मकता लाने के बजाय उनके जीवन में दुखों का कारण बना।
मैं ले के दिल के रिश्ते घर से निकल चुका हूँ
मैं ले के दिल के रिश्ते घर से निकल चुका हूँ,
दीवार-ओ-दर के रिश्ते वार-ओ-दर में होंगे ।
जौन एलिया ✍️
जौन एलिया का यह शेर गहरे भावनात्मक विछोह और अलगाव को दर्शाता है। इसका अर्थ है कि अब कवि अपने दिल की भावनाओं और सच्चे रिश्तों को लेकर घर से विदा ले चुका है; अब उसके लिए घर के भौतिक रिश्ते (दीवार-ओ-दर यानी घर की दीवारें) केवल वहीं तक सीमित हैं। यह भावना है कि अपनापन खत्म हो चुका है, अब सब कुछ औपचारिक और निर्जीव हो गया है।
शेर का विस्तृत अर्थ:
"मैं ले के दिल के रिश्ते घर से निकल चुका हूँ": मैंने अब अपने प्यार, जज्बात और अपनत्व (दिल के रिश्ते) को समेट लिया है और इस घर को छोड़ दिया है जहाँ अब इन रिश्तों की कोई कद्र नहीं है।
"दीवार-ओ-दर के रिश्ते दीवार-ओ-दर में होंगे": घर की भौतिक वस्तुओं (दीवारों और दरवाजों) का रिश्ता अब केवल घर तक ही सीमित है। मेरे लिए इस घर के लोगों से अब भावनात्मक जुड़ाव खत्म हो चुका है, वे निर्जीव दीवारों की तरह हो गए हैं।
भाव: यह शेर घर के भीतर अकेलेपन, घुटन और रिश्तों के टूटने (detachment) की स्थिति को बयां करता है, जहाँ इंसान अपने ही घर में बेगाना हो जाता है।
सामने थे हथियार बहुत
Sunday, April 19, 2026
Quotes by Franz Kafka
इसलिए वे भ्रम किराए पर लेते हैं
और उसे खुशी कहते हैं।
- जन्म और परिवार: काफ़्का का जन्म 3 जुलाई 1883 को प्राग के एक मध्यमवर्गीय यहूदी परिवार में हुआ था।
- शिक्षा और पेशा: उन्होंने कानून की पढ़ाई की और 1907 से 1922 तक बीमा कंपनियों में क्लर्क के रूप में काम किया, जिसे वे अपने लेखन के लिए एक बोझ मानते थे।
- लेखन शैली: उनकी रचनाओं में अस्तित्वगत भय, अपराध-बोध और व्यक्तिगत अलगाव (alienation) मुख्य विषय थे।
- प्रमुख रचनाएँ: द मेटामॉर्फोसिस (Die Verwandlung), द ट्रायल (Der Process), और द कासल (Das Schloss)।
- निजी जीवन और संघर्ष: उनका अपने पिता के साथ संबंध तनावपूर्ण था, जिसे उन्होंने लेटर टू हिज फादर (Letter to His Father) में व्यक्त किया। वे उम्र भर आत्म-संदेह से ग्रस्त रहे।
- मृत्यु: 3 जून 1924 को क्षय रोग (Tuberculosis) के कारण वियना के पास उनकी मृत्यु हो गई।
- द मेटामॉर्फोसिस (The Metamorphosis - 1915): यह लघु उपन्यास उनकी सबसे प्रसिद्ध रचनाओं में से एक है, जिसमें मुख्य पात्र ग्रेगोर सैमसा एक कीड़े में बदल जाता है।
- द ट्रायल (The Trial - 1925): यह एक उपन्यास है जो एक ऐसे व्यक्ति की कहानी बताता है जिसे किसी अज्ञात अपराध के लिए गिरफ्तार किया जाता है।
- द कैसल (The Castle - 1926): इस उपन्यास में भी एक अनाम नायक की संघर्षमय यात्रा को दर्शाया गया है।
- छोटी कहानियाँ और सूक्तियाँ: काफ्का अपनी छोटी कहानियों के लिए भी प्रसिद्ध हैं, जो उनके लंबे कार्यों के समान ही गंभीर विषयों को हास्य के साथ प्रस्तुत करती हैं।
Friday, April 17, 2026
दिल पे ज़ख़्म खाते हैं जान से गुज़रते हैं
दिल पे ज़ख़्म खाते हैं जान से गुज़रते हैं
जुर्म सिर्फ़ इतना है उन को प्यार करते हैं
वो जो फेर कर नज़रें पास से गुज़रते हैं
ऐ ग़म-ए-ज़माना हम तुझ को याद करते हैं
वो दयार-ए-जानाँ हो या ज्वार-ए-मय-ख़ाना
गर्दिशें ठहरती हैं हम जहाँ ठहरते हैं
ए'तिबार बढ़ता है और भी मोहब्बत का
जब वो अजनबी बन कर यास से गुज़रते हैं ।
इक़बाल सफ़ीपुरी✍️
Thursday, April 16, 2026
बे-क़रारी सी बे-क़रारी है
बे-क़रारी सी बे-क़रारी है
अब यही ज़िंदगी हमारी है
मैं ने उस को पिछाड़ना है मियाँ
मेरी साए से जंग जारी है
इश्क़ करना भी लाज़मी है मगर
मुझ पे घर की भी ज़िम्मेदारी है
प्यार है मुझ को ज़िंदगी से बहुत
और तू ज़िंदगी से प्यारी है
मैं कभी ख़ुद को छोड़ता ही नहीं
मेरी ख़ुद से अलग सी यारी है
शहर का शहर सो गया 'ताबिश'
अब मिरे जागने की बारी है ।
तोशिफ ताबिश ✍️
Wednesday, April 15, 2026
दिल को तिरी चाहत पे भरोसा भी बहुत है
Tuesday, April 14, 2026
ਮੈਂ ਉਥੇ ਆਕੇ ਰੁਕ ਗਿਆ ਹਾਂ
ਜਿੱਥੇ ਆਕੇ ਰੁਕਣ ਲਈ
ਤੁਸੀਂ ਮੈਨੂੰ ਕਿਹਾ ਸੀ
ਮੈਂ ਉਥੇ ਆਕੇ ਰੁਕ ਗਿਆ ਹਾਂ
ਘੜੀ ਦੀਆਂ ਸੂਈਆਂ
ਮੇਰੇ ਤੋਂ ਰੁਕਣ ਦੀ ਵਜ੍ਹਾ ਪੁੱਛਦੀਆਂ
ਹੁਣ ਤੁਸੀਂ ਖ਼ੁਦ ਹੀ ਦੱਸੋ
ਮੈਂ ਵਕਤ ਨੂੰ ਕੀ ਜਵਾਬ ਦਵਾਂ
ਜਾਂ ਖੁਦ ਹੀ ਕਿਹ ਦਵਾਂ ਕਿ
ਮੈਂ ਆਪਣੇ ਰਾਹਾਂ ਤੋਂ ਭਟਕ
ਤੁਰ ਪਿਆ ਹਾਂ
ਕਿਸੇ ਬੈਗਾਨੇ ਸਫ਼ਰ ਤੇ
ਪਰਾਈ ਮੰਜ਼ਿਲ ਵੱਲ ।
ਅਮਰ ਸੰਘਰ✍️









