Friday, May 8, 2026

दालान में कभी कभी छत पर खड़ा हूँ मैं

दालान  में  कभी  कभी  छत  पर  खड़ा हूँ मैं
सायों  के  इंतिज़ार  में  शब  भर  खड़ा  हूँ मैं

क्या  हो  गया  कि  बैठ  गई  ख़ाक  भी मिरी
क्या  बात  है  कि  अपने  ही ऊपर खड़ा हूँ मैं

फैला   हुआ   है   सामने    सहरा-ए-बे-कनार
आँखों  में  अपनी  ले  के  समुंदर  खड़ा  हूँ  मैं

सन्नाटा   मेरे   चारों   तरफ़    है   बिछा   हुआ
बस दिल की धड़कनों को पकड़ कर खड़ा हूँ मैं

सोया  हुआ  है  मुझ  में  कोई शख़्स आज रात
लगता  है  अपने  जिस्म  से  बाहर  खड़ा  हूँ  मैं

इक  हाथ  में  है  आईना-ए-ज़ात-ओ-काएनात
इक   हाथ  में   लिए   हुए   पत्थर  खड़ा  हूँ  मैं ।









सालिम सलीम ✍️

हवा से इस्तिफ़ादा कर लिया है

हवा  से  इस्तिफ़ादा  कर  लिया  है
चराग़ों  को  लिबादा  कर  लिया  है

बहुत जीने की ख़्वाहिश हो रही थी
सो  मरने  का  इरादा  कर  लिया है

मैं  घटता  जा  रहा हूँ  अपने  अंदर
तुम्हें  इतना  ज़ियादा  कर लिया  है

जो  काँधों  पर उठाए  फिर रहा  था
वो   ख़ेमा   ईस्तादा  कर   लिया  है

न  था  कुछ  भी  मिरी  पेचीदगी  में
तो  मैं ने ख़ुद को सादा कर लिया है ।








सालिम सलीम ✍️

आसमानों पे फ़क़त चाँद सितारे निकले

आसमानों  पे   फ़क़त   चाँद  सितारे   निकले
मेरी आँखों में  तो तुम इन से भी प्यारे  निकले

अपने   जैसी  कोई  तस्वीर  बनानी   थी  मुझे
मिरे   अंदर  से    सभी    रंग   तुम्हारे   निकले

हम ने महसूस किया ही था तुझे आज की शाम
जो   हुई  रात  तो  पलकों   पे  सितारे   निकले

मुझ में इक रोज़ कोई क़त्ल हुआ था और  फिर
मेरी  आँखों   से  बहुत  ख़ून  के   धारे   निकले

मैं  ने  सोचा  था  कि  नम-ख़ुर्दा  है  मेरी  मिट्टी
छू  के  देखा  तो   तह-ए-ख़ाक  शरारे   निकले ।








सालिम सलीम ✍️




 

मिरे ठहराव को कुछ और भी वुसअत दी जाए

मिरे ठहराव को  कुछ और भी वुसअत दी जाए
अब मुझे ख़ुद से निकलने की इजाज़त दी जाए

मौत  से  मिल  लें   किसी   गोशा-ए-तन्हाई  में
ज़िंदगी  से  जो  किसी  दिन हमें फ़ुर्सत दी जाए

बे-ख़द-ओ-ख़ाल सा इक चेहरा लिए फिरता हूँ
चाहता हूँ कि मुझे शक्ल-ओ-शबाहत  दी जाए

भरे  बाज़ार   में  बैठा  हूँ  लिए  जिंस-ए-वजूद
शर्त  ये  है  कि मिरी ख़ाक की क़ीमत दी  जाए

बस  कि  दुनिया  मिरी  आँखों  में समा जाएगी
कोई दिन और मिरे ख़्वाब को मोहलत दी जाए ।



सालिम सलीम✍️





ज़ेहन की क़ैद से आज़ाद किया जाए उसे

ज़ेहन  की क़ैद  से  आज़ाद किया  जाए  उसे
जिस को पाना नहीं क्या याद किया जाए उसे

तंग है रूह की ख़ातिर जो ये वीराना-ए-जिस्म
तुम  कहो तो  अदम-आबाद  किया जाए उसे

ज़िंदगी  ने जो  कहीं का  नहीं रक्खा मुझ  को
अब  मुझे  ज़िद है  कि बर्बाद किया जाए उसे

ये  मिरा  सीना-ए-ख़ाली  छलक  उट्ठेगा अभी
मेरे   अंदर  अगर   ईजाद   किया   जाए   उसे

वो  गली  पूछती  है  दर-ब-दरी   के  अहवाल
हाँ तो फिर वाक़िफ़-ए-रूदाद किया जाए उसे ।




सालिम सलीम ✍️






 

फ़िक्र मर जाए तो फिर जौन का मातम करना

 


फ़िक्र मर जाए तो फिर जौन का मातम करना
हम जो जिंदा हैं तो फिर 'जौन' की बरसी कैसी ।
 जौन एलिया ✍️ 

यह शेर जौन एलिया (Jaun Elia) के अंदाज़-ए-बयां और उनके 'निहिलिस्टिक' (शून्यवादी) नजरिये को दर्शाता है। यह एक बेहद गहरा और दार्शनिक शेर है, जो इंसान की सोच (फिक्र/चेतना) को उसके अस्तित्व से भी ज्यादा महत्वपूर्ण मानता है।

अर्थ:

इसका मतलब है कि इंसान की असली मौत उसका जिस्म (शरीर) नहीं, बल्कि उसकी 'फिक्र' (सोच, समझ, संवेदना, जमीर) का मर जाना है। जब इंसान के अंदर से सही-गलत की समझ, भावनाएँ, और फिक्र खत्म हो जाए, तब उसके जिस्म के मरने पर मातम (शोक) करना चाहिए, क्योंकि तब तक वह सिर्फ एक ज़िंदा लाश की तरह है।




Thursday, May 7, 2026

ये कैसी आग है मुझ में कि एक मुद्दत से



 ये कैसी आग है मुझ में कि एक मुद्दत से
तमाशा देख रहा हूँ मैं अपने जलने का 

सालिम सलीम ✍️

यह प्रसिद्ध शेर सालिम सलीम (Salim Saleem) द्वारा रचित है, जो खुद को जलते हुए देखने की बेबसी और कशमकश को दर्शाता है। यह एक मशहूर शेर है जो अक्सर रेख़्ता और अन्य शायरी मंचों पर साझा किया जाता है। 

भावार्थ:

शायर अपनी ही रूह या हालातों की तपिश से वाकिफ है, लेकिन लंबे समय (मुद्दत) से वो इस कदर बेबस या उदासीन हो चुका है कि खुद को बर्बाद होते हुए एक दर्शक (तमाशबीन) की तरह देख रहा है। यह आत्म-विनाश और बेबसी का गहरा एहसास है।



Friday, May 1, 2026

सर्दी गर्मी बरखा तीनों एक साथ ही बस्ते हैं

सर्दी गर्मी बरखा तीनों एक साथ ही बस्ते हैं
तेरे बदन में वो जादू है सारे मौसम रहते हैं

तेरे मेरे बीच नहीं है ख़ून का रिश्ता फिर भी क्यूँ
तेरी आँख के सारे आँसू मेरी आँख से बहते हैं

एक ज़माना बीता तेरे प्यार के जंगल से निकले
याद के साँप तो तन्हाई में आज भी मुझ को डसते हैं

वा'दा कर के भूल भी जाना ये तो तेरी आदत है
मैं ही नहीं कहता हूँ ऐसा लोग भी अक्सर कहते हैं


प्रेम भण्डारी✍️

Friday, April 24, 2026

ये काफ़ी है कि हम दुश्मन नहीं हैं,वफ़ा-दारी का दावा क्यूँ करें हम


 


ये काफ़ी है कि हम दुश्मन नहीं हैं,वफ़ा-दारी का दावा क्यूँ करें हम
नया इक रिश्ता पैदा क्यूँ करें हम, बिछड़ना है तो झगड़ा क्यूँ करें हम

जौन एलिया ✍️ 


ये काफ़ी है कि हम दुश्मन नहीं हैं,
वफ़ा-दारी का दावा क्यूँ करें हम

यह शेर मशहूर शायर जौन एलिया की ग़ज़ल से है, जो बिछड़ने या रिश्तों में औपचारिकता (formality) खत्म होने का ज़िक्र करता है। इसका अर्थ है कि जब रिश्ता टूट रहा हो, तो जबरदस्ती वफादारी निभाने या प्यार का दिखावा करने की जरूरत नहीं है। इतना ही काफी है कि हम एक-दूसरे के दुश्मन नहीं हैं, एक-दूसरे का बुरा नहीं चाहते। 

विस्तृत अर्थ:

मूल भाव: यथार्थवाद (realism) और रिश्तों में ईमानदारी।

भावार्थ: शायर कहते हैं कि जब हम अलग हो ही रहे हैं, तो रिश्ते में अब वफा, मोहब्बत, या कुर्बानी का दिखावा (दावा) क्यों करें? यह ज़बरदस्ती का बोझ उठाने से बेहतर है कि हम बस इतना मान लें कि हम दुश्मन नहीं हैं, इतना काफी है।

संदर्भ: यह शायरी रिश्तों के टूटने पर बिना हंगामा किए, गरिमा के साथ अलग होने की बात करती है। 

नया इक रिश्ता पैदा क्यूँ करें हम, 
बिछड़ना है तो झगड़ा क्यूँ करें हम

यह शेर मशहूर शायर जौन एलिया का है। इसमें प्यार और अलगाव (separation) के प्रति एक बहुत ही व्यावहारिक और थोड़ा कड़वा नज़रिया पेश किया गया है।

इसका सरल अर्थ और भाव कुछ इस प्रकार है:

1. "नया इक रिश्ता पैदा क्यूँ करें हम"
शायर कहता है कि जब हमें पता है कि अंत में अलग ही होना है, तो फिर से एक-दूसरे के करीब आने या किसी नए किस्म के रिश्ते (जैसे दोस्ती या फिर से सुलह) को शुरू करने की क्या ज़रूरत है?

2. "बिछड़ना है तो झगड़ा क्यूँ करें हम"
यह हिस्सा सबसे गहरा है। अक्सर लोग लड़-झगड़ कर या नफरत के साथ अलग होते हैं। लेकिन शायर कहता है कि अगर अलग होना तय ही है, तो इसे कड़वाहट और हंगामे के साथ क्यों किया जाए? क्यों न खामोशी और गरिमा (dignity) के साथ एक-दूसरे से विदा ली जाए।


काली काली ज़ुल्फ़ों के फंदे न डालो

भूल हो जाती है यूँ तैश में आया न करो
फ़ासले ख़त्म करो बात बढ़ाया न करो
ये निगाहें ये इशारे ये अदाएँ तौबा
इन शराबों को सर-ए-'आम लुटाया न करो
शाम गहरी हो तो कुछ और हसीं होती है
साया-ए-ज़ुल्फ़ को चेहरे से हटाया न करो
काली काली ज़ुल्फ़ों के फंदे न डालो
हमें ज़िंदा रहने दो ऐ हुस्न वालो

न छेड़ो हमें हम सताए हुए हैं
बहुत ज़ख़्म सीने पे खाए हुए हैं
सितम-गर हो तुम ख़ूब पहचानते हैं
तुम्हारी अदाओं को हम जानते हैं
दग़ा-बाज़ हो तुम सितम ढाने वाले
फ़रेब-ए-मोहब्बत में उलझाने वाले
ये रंगीं कहानी तुम्ही को मुबारक
तुम्हारी जवानी तुम्ही को मुबारक
हमारी तरफ़ से निगाहें हटा लो
काली काली ज़ुल्फ़ों के फंदे न डालो
हमें ज़िंदा रहने दो ऐ हुस्न वालो


ज़ंजीर में ज़ुल्फ़ों की फँस जाने को क्या कहिए
दीवाना मेरा दिल है दीवाने को क्या कहिए
सँभालो ज़रा अपना आँचल गुलाबी
दिखाओ न हँस-हँस के आँखें शराबी
सुलूक उन का दुनिया में अच्छा नहीं है
हसीनों पे हम को भरोसा नहीं है
उठाते हैं नज़रें तो गिरती हैं बिजली
अदा जो भी निकली क़यामत ही निकली
जहाँ तुम ने चेहरे से आँचल हटाया
वहीं अहल-ए-दिल को तमाशा बनाया
काली काली ज़ुल्फ़ों के फंदे न डालो
हमें ज़िंदा रहने दो ऐ हुस्न वालो


ख़ुदा के लिए हम पे डोरे न डालो
हमें ज़िंदा रहने दो ऐ हुस्न वालो
आवारा हुई जाती है ज़ुल्फ़ों को सँभालो
दिल मेरा उलझ जाएगा ये जाल न डालो
काली काली ज़ुल्फ़ों के फंदे न डालो
हमें ज़िंदा रहने दो ऐ हुस्न वालो

अपनी इस ज़ुल्फ़-ए-परेशाँ को सँभालो वर्ना
ऐसे गुस्ताख़ को हम चूम लिया करते हैं
काली काली ज़ुल्फ़ों के फंदे न डालो
हमें ज़िंदा रहने दो ऐ हुस्न वालो

उलझा है पाँव यार का ज़ुल्फ़-ए-दराज़ में
लो आप अपने दाम में सय्याद आ गए
काली काली ज़ुल्फ़ों के फंदे न डालो
हमें ज़िंदा रहने दो ऐ हुस्न वालो

सदा वार करते हो तेग़-ए-वफ़ा का
बहाते हो तुम ख़ून अहल-ए-वफ़ा का
ये नागिन सी ज़ुल्फ़ें ये ज़हरीली नज़रें
वो पानी न माँगे ये जिस को डस ले
वो लुट जाए जो तुम से दिल को लगा ले
फिर हसरतों का जनाज़ा उठाए
है मा'लूम हम को तुम्हारी हक़ीक़त
मोहब्बत के पर्दे में करते हो नफ़रत
कहीं और जा के अदाएँ उछालो
काली काली ज़ुल्फ़ों के फंदे न डालो
हमें ज़िंदा रहने दो ऐ हुस्न वालो

ये झूटी नुमाइश ये झूटी बनावट
फ़रेब-ए-नज़र है नज़र की लगावट
ये सुम्बुल से गेसू ये 'आरिज़ गुलाबी
ज़माने मिलाएँगे इक दिन ख़राबी
'फ़ना' हम को कर दे न ये मुस्कुराना
अदा काफ़िराना चलन ज़ालिमाना
दिखाओ न ये इश्वा-ओ-नाज़ हम को
किसी और पर ज़ुल्फ़ का जाल डालो
सिखाओ न उल्फ़त के अंदाज़ हम को
काली काली ज़ुल्फ़ों के फंदे न डालो
हमें ज़िंदा रहने दो ऐ हुस्न वालो

अपनी ज़ुल्फ़ों का पर्दा बना लीजिए
हुस्न-ए-मा'सूम अब फ़ित्ना-गर हो गया
पलकें गिर जाएँगी डोर जल जाएगा
रुख़ तुम्हारी नज़र का जिधर हो गया
काली काली ज़ुल्फ़ों के फंदे न डालो
हमें ज़िंदा रहने दो ऐ हुस्न वालो ।


फ़ना बुलंदशहरी✍️