हम न करने के काम करते हैं
और अजब तरह कर गुजरते हैं
मार डालें उसे यह है मक़सूद
सो मिंया जी हम उस पे मरते हैं
मैं हूँ उस शहर में मुक़ीम जहां
अपने होने से लोग डरते हैं
रंग ही क्या तेरे संवरने का
हम लहू थूक कर संवरते हैं
अपने गंगो-जमन में ज़हर था क्या?
हम समंदर का दम जो भरते हैं
नाव समझें भँवर को "जाॅन" जो लोग
बस वही डूब कर उभरते हैं ।
जौन एलिया ✍️